श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  6.3.28 
तानानयध्वमसतो विमुखान् मुकुन्द-
पादारविन्दमकरन्दरसादजस्रम् ।
निष्किञ्चनै: परमहंसकुलैरसङ्गै-
र्जुष्टाद्गृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
परमहंस आदरणीय व्यक्ति होते हैं, जिन्हें भौतिक सुखों में जरा भी रुचि नहीं होती और जो भगवान के चरणकमलों का मधुर रस पान करते हैं। मेरे सेवकों! मेरे सामने केवल उन लोगों को दंडित करने के लिए लाओ जो उस मधुर रस का स्वाद लेने से दूर हैं, जो परमहंसों की संगति नहीं करते और जो गृहस्थ जीवन और सांसारिक सुखों में लिप्त रहते हैं, क्योंकि ये नरक की ओर ले जाने वाले रास्ते हैं।
 
Paramahamsas are respectable persons who have no interest in material enjoyment and who drink the honey of the Lord's lotus feet. O my servants! Bring to me for punishment only those persons who are averse to the taste of that honey, who do not keep the company of Paramahamsas and who are involved in domestic life and worldly enjoyment, because these are the paths leading to hell.
तात्पर्य
यमदूतों को भक्तों का सामीप्य त्यागने की चेतावनी देने के बाद, यमराज अब बताते हैं कि किसको उनके आगे लाया जाना है। वह विशिष्ट रूप से यमदूतों को सलाह देते हैं कि सांसारिक व्यक्ति जो गृहस्थ जीवन में केवल सेक्स के लिए लिप्त हैं, उन्हें उनके सामने लाया जाए। जैसा कि श्रीमद-भागवतम में कहा गया है, यन मैथुनादि-गृहमेधि-सुखं हि तुच्छम्: लोग गृहस्थ जीवन से केवल सेक्स के लिए ही जुड़े हैं। वे हमेशा अपने भौतिक व्यवहारों से कई तरह से परेशान रहते हैं, और उनकी एकमात्र खुशी यह है कि पूरे दिन बहुत मेहनत करने के बाद, रात में वे सोते हैं और सेक्स में लिप्त रहते हैं। निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः: रात में, भौतिकवादी गृहस्थ सोते हैं या सेक्स जीवन में लिप्त रहते हैं। दिवा चार्तेहाय राजन् कुटुम्बा-भारणेन वा: दिन के दौरान वे यह पता लगाने में व्यस्त रहते हैं कि पैसा कहाँ है, और अगर उन्हें पैसा मिल जाता है तो वे इसे अपने परिवारों के भरण-पोषण के लिए खर्च करते हैं। यमराज विशेष रूप से अपने सेवकों को सलाह देते हैं कि वे इन व्यक्तियों को सजा के लिए उनके सामने लाएँ और भक्तों को न लाएँ, जो हमेशा भगवान के चरण कमलों में मधु को चाटते हैं, जो सभी के समान हैं, और जो सभी जीवित संस्थाओं के लिए सहानुभूति के कारण कृष्ण भावनामृति का प्रचार करने की कोशिश करते हैं। भक्त यमराज द्वारा दंड के भागी नहीं हैं, लेकिन जिन व्यक्तियों को कृष्ण भावना का कोई ज्ञान नहीं है, उन्हें तथाकथित पारिवारिक आनंद के उनके भौतिक जीवन द्वारा संरक्षित नहीं किया जा सकता है। श्रीमद्-भागवतम कहता है (२.१.४):

देहापत्य-कलत्रादिष्व

आत्म-सैन्येष्वसत्स्वपि

तेषां प्रमत्तो निधनं

पश्यन्नापि न पश्यति

ऐसे व्यक्ति आत्मसंतुष्टि से मानते हैं कि उनके राष्ट्र, समुदाय या परिवार उनकी रक्षा कर सकते हैं, इस बात से अनजान कि समय के साथ ऐसे सभी अचूक सैनिक नष्ट हो जाएँगे। अंत में, व्यक्ति को चाहिए कि वह उन व्यक्तियों के साथ जुड़ने का प्रयास करें जो चौबीसों घंटे भक्ति सेवा में लगे रहते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)