अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि
जानति तत्त्वं भगवन्-महिम्नो
न चान्य एकोपि चिरं विचिन्वन्
इसका अर्थ यह है कि यद्यपि कोई वैदिक शास्त्रों का बहुत बड़ा विद्वान हो सकता है, फिर भी वह भगवान की सर्वोच्चता और उनके नाम, ख्याति, और गुणों से पूर्ण रूप से अनजान हो सकता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति बड़ा विद्वान नहीं है, वह भगवान की सर्वोच्चता की स्थिति समझ सकता है यदि वह किसी तरह भगवान की भक्ति में लगकर उनका शुद्ध भक्त बन जाता है। इसलिए यमराज द्वारा बोला गया छंद कहता है - "एवं विमृश्य सुधियो भगवति" - वह जो भगवान की प्रेमपूर्ण सेवा में लग जाता है वह 'सुधी' यानी बुद्धिमान हो जाता है। लेकिन ऐसा वैदिक विद्वानों के साथ नहीं है जो कृष्ण के नाम, यश और गुणों को नहीं समझते। शुद्ध भक्त वह होता है जिसकी बुद्धि साफ होती है। वह वास्तव में विचारशील होता है क्योंकि वह भगवान की सेवा में लगा रहता है - सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं, बल्कि अपने मन, वचन और शरीर से प्रेमपूर्वक सेवा में लगा रहता है। अधर्मी लोग धर्म का दिखावा करते हैं, लेकिन यह उतना प्रभावी नहीं होता क्योंकि यद्यपि वे दिखावे के तौर पर मंदिर या चर्च जाते हैं, परंतु उनका ध्यान कहीं और होता है। ऐसे लोग अपने धार्मिक कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं और यमराज उन्हें दंडित करते हैं। लेकिन वह भक्त जो पाप कर्म करता है, जो वह अनजाने में या आकस्मिक रूप से अपनी पुरानी आदतों की वजह से कर सकता है, उसे क्षमा कर दिया जाता है। यही नृत्य-कीर्तन आंदोलन का मूल्य है।
