विशेष रूप से कलियुग में, केवल कीर्तन ही पर्याप्त है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हमारे मंदिरों के सदस्य केवल देवता के सामने कीर्तन जारी रखें, विशेषकर श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने, वे परिपूर्ण रहेंगे। किसी अन्य प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी, स्वयं को आदतों और मन में स्वच्छ रखने के लिए, देवता की पूजा और अन्य नियमक सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। श्रील जीवा गोस्वामी कहते हैं कि यद्यपि जीवन की पूर्णता के लिए कीर्तन पर्याप्त है, मंदिर में देवता का अर्चना या पूजा जारी रहेगी ताकि भक्त स्वच्छ और शुद्ध रहें। इसलिए श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने सिफारिश की कि एक दोनों प्रक्रियाओं का पालन करे। हम देवता पूजा और कीर्तन को समानांतर रेखाओं पर करने के उनके सिद्धांत का सख्ती से पालन करते हैं। यह हमें जारी रखना चाहिए।
