श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.3.25 
प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं
देव्या विमोहितमतिर्बत माययालम् ।
त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां
वैतानिके महति कर्मणि युज्यमान: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि वे परम निरपेक्ष परमात्मा की मायावी शक्ति से मोहित हैं, इसलिए याज्ञवल्क्य, जैमिनि और धार्मिक ग्रंथों के अन्य लेखक भी बारह महाजनों की रहस्यमय धार्मिक प्रणाली को नहीं जान सकते। वे भक्ति करने या हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने के दिव्य महत्व को नहीं समझ सकते। चूँकि उनके मन वेदों - विशेषकर यजुर्वेद, सामवेद और ऋग्वेद में उल्लिखित अनुष्ठानों की ओर आकर्षित होते हैं - इसलिए उनकी बुद्धि सुस्त हो गई है। इस प्रकार वे उन अनुष्ठानों के लिए सामग्री एकत्र करने में व्यस्त रहते हैं जो केवल अस्थायी लाभ देते हैं, जैसे कि भौतिक सुख के लिए स्वर्गलोक में ऊपर उठाना। वे संकीर्तन आंदोलन के प्रति आकर्षित नहीं होते हैं; बल्कि, वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में रुचि रखते हैं।
 
Because of being bewildered by the illusion of the Supreme Personality of Godhead, even Yajnavalkya, Jaimini and other expounders of scriptures cannot know the secret religious system of the twelve mahjanas. They cannot understand the transcendental significance of performing devotional service or chanting the Hare Krsna mantra. Because their minds are attracted to the rituals described in the Vedas—especially the Yajurveda, Samaveda and Rigveda—their intelligence has become dull. Thus they are busy collecting materials for rituals that give only mortal benefits—such as going to heaven for material happiness. They are not attracted to the sankirtana movement but they are interested in dharma, artha, kama and moksha.
तात्पर्य
जैसा कि आसानी से प्रभु के पवित्र नाम का जप करने से सबसे अधिक सफलता प्राप्त की जा सकती है, यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि इतने वैदिक अनुष्ठानिक समारोह क्यों हैं और लोग उनमें क्यों आकर्षित होते हैं। यह पद उस प्रश्न का उत्तर देता है। जैसा कि भगवद-गीता (15.15) में कहा गया है, वेदैश् च सर्वैर अहम् एव वेद्यः: वेदों का अध्ययन करने का वास्तविक उद्देश्य भगवान कृष्ण के चरण कमलों के पास जाना है। दुर्भाग्य से, वैदिक यज्ञों की भव्यता से भ्रमित होने वाले मूर्ख लोग भव्य यज्ञों को संपन्न होते हुए देखना चाहते हैं। वे वैदिक मंत्र जपते हैं और ऐसे समारोहों पर भारी मात्रा में धन खर्च किया जाना चाहते हैं। कभी-कभी हमें ऐसे मूर्ख पुरुषों को खुश करने के लिए वैदिक अनुष्ठानिक समारोहों का निरीक्षण करना पड़ता है। हाल ही में, जब हमने वृंदावन में एक बड़ा कृष्ण-बलराम मंदिर स्थापित किया है, तो हम ब्राह्मणों द्वारा वैदिक समारोहों का आयोजन करने के लिए बाध्य हुए क्योंकि वृंदावन के निवासी, विशेष रूप से स्मार्ट-ब्राह्मण, यूरोपीय और अमेरिकियों को वास्तविक ब्राह्मण के रूप में स्वीकार नहीं करते थे। इसलिए हमें ब्राह्मणों को महंगे यज्ञ करने के लिए नियुक्त करना पड़ा। इन यज्ञों के बावजूद, हमारे समाज के सदस्यों ने मृदंगों के साथ जोर से कीर्तन किया और मैं ने कीर्तन को वैदिक अनुष्ठानिक समारोहों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना। दोनों समारोह और कीर्तन एक साथ चल रहे थे। समारोह स्वर्गीय ग्रहों (जड़ी-कृत-मतिर मधु-पुष्पितायाम) के लिए वैदिक अनुष्ठानों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए थे, जबकि कीर्तन परम पुरुष भगवान को खुश करने में रुचि रखने वाले शुद्ध भक्तों के लिए थे। हम बस कीर्तन करते, पर फिर वृंदावन के निवासियों ने स्थापना समारोह को गंभीरता से नहीं लिया होता। जैसा कि यहाँ बताया गया है, वैदिक प्रदर्शन उन लोगों के लिए है जिनकी बुद्धि वेदों की फूलों वाली भाषा से सुस्त हो गई है, जो उन फलों की गतिविधियों का वर्णन करती हैं जो हमें उच्च ग्रहों तक ले जाने के लिए हैं।

विशेष रूप से कलियुग में, केवल कीर्तन ही पर्याप्त है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में हमारे मंदिरों के सदस्य केवल देवता के सामने कीर्तन जारी रखें, विशेषकर श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने, वे परिपूर्ण रहेंगे। किसी अन्य प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर भी, स्वयं को आदतों और मन में स्वच्छ रखने के लिए, देवता की पूजा और अन्य नियमक सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। श्रील जीवा गोस्वामी कहते हैं कि यद्यपि जीवन की पूर्णता के लिए कीर्तन पर्याप्त है, मंदिर में देवता का अर्चना या पूजा जारी रहेगी ताकि भक्त स्वच्छ और शुद्ध रहें। इसलिए श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने सिफारिश की कि एक दोनों प्रक्रियाओं का पालन करे। हम देवता पूजा और कीर्तन को समानांतर रेखाओं पर करने के उनके सिद्धांत का सख्ती से पालन करते हैं। यह हमें जारी रखना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)