श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.3.22 
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्म: पर: स्मृत: ।
भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभि: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान के नाम कीर्तन से शुरू होने वाली भक्ति, मानव समाज में जीव के लिए परम धार्मिक सिद्धांत है।
 
The devotion which begins with the chanting of the name of the Lord is the ultimate religious principle for a living being in human society.
तात्पर्य
जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया था, धर्मं भागवतम, वास्तविक धार्मिक सिद्धांत, भागवत-धर्म हैं, जो स्वयं श्रीमद्-भागवतम में या भागवतम के प्रारंभिक अध्ययन भगवद-गीता में वर्णित सिद्धांत हैं। ये सिद्धांत क्या हैं? भागवतम कहता है, धर्मः प्रोञ्जित-कैतवोऽत्र: श्रीमद्-भागवतम में कोई धोखेबाज़ धार्मिक प्रणालियाँ नहीं हैं। भागवतम में सब कुछ सीधे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ है। भागवतम आगे कहता है, स वं पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे: सर्वोच्च धर्म वह है जो अपने अनुयायियों को सिखाता है कि कैसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से प्रेम करें, जो प्रायोगिक ज्ञान की पहुँच से परे है। ऐसी धार्मिक प्रणाली तन-नाम-ग्रहण, भगवान के पवित्र नाम का जाप (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पा: सेवनम) से शुरू होती है। प्रभु के पवित्र नाम का जाप करने और परमानंद में नाचने के बाद, व्यक्ति धीरे-धीरे भगवान के रूप, भगवान के लीला और भगवान के दिव्य गुणों को देखता है। इस तरह व्यक्ति भगवान के व्यक्तित्व की स्थिति को पूरी तरह से समझता है। व्यक्ति भगवान की इस समझ में आ सकता है कि वह कैसे भौतिक दुनिया में अवतरित होते हैं, कैसे जन्म लेते हैं और किन गतिविधियों को करते हैं। लेकिन व्यक्ति इसे केवल भक्ति सेवा करने से ही जान सकता है। जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, भक्त्या मामभिजानाति: केवल भक्ति सेवा से ही कोई सर्वोच्च भगवान के बारे में सब कुछ समझ सकता है। यदि कोई सौभाग्य से इस तरह से भगवान को समझता है, तो परिणाम होता है त्याक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति: अपने भौतिक शरीर को त्यागने के बाद, उसे अब इस भौतिक दुनिया में जन्म नहीं लेना पड़ता है। इसके बजाय, वह घर लौटता है, भगवान के पास वापस चला जाता है। वही परम पूर्णता है। इसलिए कृष्ण भगवद गीता (8.15) में कहते हैं:

मामुपेत्य पुनर्जन्म

दुःखालयं अशाश्वतम

ना‍्पुनवंति महात्मानः

सं सिद्धिं परमां गता:

"मुझे प्राप्त करने के बाद, महान आत्माएँ, जो भक्ति में योगी हैं, इस अस्थायी दुनिया में कभी नहीं लौटते हैं, जो दुखों से भरी हुई है, क्योंकि उन्होंने सबसे उच्च पूर्णता प्राप्त कर ली है।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)