यं वै न गोभिर्मनसासुभिर्वा
हृदा गिरा वासुभृतो विचक्षते ।
आत्मानमन्तर्हृदि सन्तमात्मनां
चक्षुर्यथैवाकृतयस्तत: परम् ॥ १६ ॥
अनुवाद
जैसा कि शरीर के विभिन्न अंग आंखों को नहीं देख सकते हैं, उसी तरह सारे जीव उस परम आत्मा को नहीं देख सकते जो हर एक के हृदय में रहती है। न तो इंद्रियों से, न मन से, न प्राणवायु से, न हृदय में विचारों से, और न ही शब्दों के कंपन से जीव परम आत्मा की वास्तविक स्थिति का पता लगा सकते हैं।
Just as the various parts of the body cannot see the eyes, similarly all living beings cannot see the Supreme Lord who resides in everyone's heart as the Supersoul. Neither by the senses, nor by the mind, nor by the breath, nor by the thoughts within the heart, nor by the sound of words can living beings ascertain the real position of the Supreme Lord.
तात्पर्य
यद्यपि शरीर के विभिन्न अंगों में आँखों को देखने की शक्ति नहीं है, लेकिन आँखें शरीर के विभिन्न अंगों की गतिविधियों को निर्देशित करती हैं। पैर इसलिए आगे बढ़ते हैं क्योंकि आँखें देखती हैं कि उनके सामने क्या है, और हाथ इसलिए छूता है क्योंकि आँखें स्पर्श करने योग्य संस्थाओं को देखती हैं। इसी तरह, प्रत्येक जीव हृदय के भीतर स्थित परमात्मा के निर्देश के अनुसार कार्य करता है। जैसा कि भगवान ने स्वयं भगवद-गीता (15.15) में पुष्टि की है, सर्वस्य चाअम हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर् ज्ञानम पोहनं च: "मैं प्रत्येक के हृदय में बैठा हूं और स्मरण, ज्ञान और विस्मृति के लिए निर्देश देता हूं।" भगवद-गीता में कहीं और कहा गया है, ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद-देशे र्जुन तिष्ठति: "परमेश्वर, परमात्मा के रूप में, हृदय के भीतर स्थित है।" जीव परमात्मा की मंजूरी के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। परमात्मा हर क्षण कार्य कर रहा है, लेकिन जीव अपनी इंद्रियों में हेरफेर करके परमात्मा के रूप और गतिविधियों को समझ नहीं सकता है। आंखों और शारीरिक अंगों का उदाहरण बहुत उपयुक्त है। यदि अंग देख सकते थे, तो वे आंखों की मदद के बिना आगे चल सकते थे, लेकिन यह असंभव है। यद्यपि मनुष्य संवेदी गतिविधियों के माध्यम से अपने हृदय में परमात्मा को नहीं देख सकता है, लेकिन उनका निर्देश आवश्यक है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥