अत: पुंभिर द्विज-श्रेष्ठा
वर्णाश्रम-विभागश:
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य
संसिद्धिर हरि-तोषानम
"अतः हे द्विज श्रेष्ठ, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जाति विभाजनों और जीवन के आदेशों के अनुसार अपने निर्धारित कर्तव्यों [धर्म] का निर्वहन करके कोई भी जो सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता है, वह भगवान हरि को प्रसन्न करना है।" वर्णाश्रम संस्था एक व्यक्ति को भगवान के पास वापस लौटने के लिए पात्र बनाने के लिए सही प्रक्रिया प्रदान करती है, क्योंकि हर वर्ण और आश्रम का उद्देश्य पूर्ण भगवान को प्रसन्न करना है। कोई भगवान को एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में प्रसन्न कर सकता है, और यदि कोई ऐसा करता है तो उसका जीवन पूर्ण है। पूर्ण प्रभु उपासना करने योग्य हैं, और प्रत्येक व्यक्ति उसकी पूजा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से करता है। जो लोग उनकी सीधे पूजा करते हैं, उन्हें मुक्ति के परिणाम शीघ्र मिल जाते हैं, जबकि जो उनकी अप्रत्यक्ष रूप से सेवा करते हैं, उनकी मुक्ति में देरी होती है। नामाभिर वाकी शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। वर्णाश्रम संस्था में, अलग-अलग नाम होते हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी। वक्, या वैदिक निषेधाज्ञा, इन सभी प्रभागों के लिए दिशा-निर्देश देते हैं। प्रत्येक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह सर्वोच्च प्रभु को प्रणाम करे और वेदों में बताए अनुसार कर्तव्यों का पालन करे।
