श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.2.7 
अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि ।
यद्‌व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरे: ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
अजामिल पहले ही अपने सभी पापों का प्रायश्चित्त कर चुका है। वास्तव में, उसने न केवल एक जीवन में किए गए पापों के लिए प्रायश्चित्त किया है, बल्कि लाखों-करोड़ों जन्मों में किए गए पापों के लिए भी किया है, क्योंकि असहाय अवस्था में उसने भगवान नारायण का नाम लिया था। भले ही उसने शुद्ध रूप से नाम का उच्चारण नहीं किया, लेकिन उसने निंदा से दूर रहकर नाम लिया, इसलिए अब वह पवित्र है और मोक्ष का पात्र है।
 
Ajamila has already atoned for all his sins. In fact, he has atoned not only for the sins of one life but for the sins of millions of lives because he uttered the name of Narayana in a helpless state. Although he did not utter it in a pure manner, he did so without any offence, so now he is pure and entitled to salvation.
तात्पर्य
यमदूतों ने केवल अजामिल की बाहरी स्थिति पर ध्यान दिया था। चूंकि वह अपने जीवन भर अत्यंत पापी था, उनका विचार था कि उसे यमराज के पास ले जाना चाहिए और उन्हें यह नहीं पता था कि वह अपने सभी पापों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो गए थे। इसलिए विष्णु दूतों ने निर्देश दिया कि क्योंकि उसने अपनी मृत्यु के समय नारायण नाम के चार अक्षरों का उच्चारण किया था, वह सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त था। इस संबंध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने स्मृति-शास्त्र के निम्नलिखित श्लोकों को उद्धृत किया है:

नाम्नो हि यावती शक्तिः

पाप-निर्हरणे हरेः

तावत् कर्तुं न शक्नोति

पातकं पातकी नरः

"केवल हरि के एक पवित्र नाम का जाप करने से, एक पापी व्यक्ति उसके द्वारा किए जाने वाले पापों की प्रतिक्रियाओं का प्रतिकार कर सकता है।" (बृहद-विष्णु पुराण)

अवशेनापि यन्-नामनि

कीर्तिते सर्व-पातकैः

पुमान् विमुच्यते सद्यः

सिंह-त्रस्तैर्मृगैरिव

"यदि कोई भगवान के पवित्र नाम का जप करता है, तो असहाय स्थिति में भी या ऐसा करने की इच्छा न होने पर भी, उसके पापमय जीवन की सभी प्रतिक्रियाएँ दूर हो जाती हैं, जैसे जब कोई शेर दहाड़ता है, तो सभी छोटे जानवर डर के मारे भाग जाते हैं।" (गरुड़ पुराण)

सकृदुच्चरितं येन

हरिरित्यक्षर-द्वयं

बद्ध-परिकरस तेना

मोक्षाय गमनं प्रति

"भगवान के पवित्र नाम का एक बार उच्चारण करने से, जिसमें ह-रि नामक दो अक्षर हैं, व्यक्ति अपने मुक्ति के मार्ग की गारंटी देता है।" (स्कंद पुराण)

ये कुछ कारण हैं कि विष्णु दूतों ने यमदूतों द्वारा अजामिल को यमराज के दरबार में ले जाने पर आपत्ति क्यों जताई।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)