श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  6.2.49 
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।
अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ४९ ॥
 
 
अनुवाद
मृत्यु के समय तड़पते हुए अजामिल ने भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण किया और यद्यपि यह उच्चारण उनके पुत्र के प्रति निर्देशित था, फिर भी वह भगवद्धाम लौट गए। इसलिए यदि कोई भगवान के पवित्र नाम का श्रद्धापूर्वक और निरपराध भाव से उच्चारण करता है तो निश्चय ही वह भगवान के पास लौटेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।
 
Ajāmila, while suffering death, uttered the holy name of the Lord and although it was directed at his son, he returned to the abode of the Lord. Therefore, if one utters the name of the Lord with devotion and without blame, there is no doubt that he will return to the Lord.
तात्पर्य
मृत्यु के समय व्यक्ति निश्चित रूप से भ्रमित हो जाता है क्योंकि शरीर के कार्य अव्यवस्थित हो जाते हैं। उस समय, वह भी जो अपने जीवनभर हरि के पवित्र नाम का जप करने का अभ्यास करता रहा हो, हो सकता है कि हरे कृष्ण मंत्र का स्पष्ट उच्चारण ना कर पाए। फिर भी, ऐसे व्यक्ति को पवित्र नाम के सभी लाभ प्राप्त होते हैं। इसलिये जब शरीर तंदुरुस्त है, हमें भगवान के पवित्र नाम का साफ-साफ और ऊँचे स्वर में उच्चारण क्यों नहीं करना चाहिए? यदि कोई ऐसा करता है, तो यह बहुत संभव है कि मृत्यु के समय भी वह प्रेम और विश्वास के साथ भगवान के पवित्र नाम का उचित रूप से उच्चारण कर पाएगा। निष्कर्षतः, जो व्यक्ति भगवान के पवित्र नाम का लगातार उच्चारण करता है, उसे संदेह के बिना घर वापस, वापस भगवान के पास जाने की गारंटी दी जाती है।

इस अध्याय की पूरक टिप्पणी।

इस अध्याय के 9 और 10 के पाठों पर श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की व्याख्या एक संवाद बनाती है कि कोई कैसे केवल भगवान के पवित्र नाम का जप करके सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो सकता है।

कोई कह सकता है, "यह स्वीकार किया जा सकता है कि भगवान के पवित्र नाम का जप करने से व्यक्ति पापपूर्ण जीवन की सभी प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाता है। हालाँकि, यदि कोई पूर्ण चेतना में पापपूर्ण कार्य करता है, और वह बार-बार करता है, तो वह बारह या उससे अधिक वर्षों तक प्रायश्चित करने के बाद भी ऐसे पापों की प्रतिक्रियाओं से खुद को मुक्त करने में असमर्थ होता है। फिर यह कैसे संभव है कि केवल एक बार भगवान के पवित्र नाम का जप करने से कोई तुरंत ऐसे पापों की प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो जाए?"

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इस अध्याय के 9 और 10 श्लोकों को उद्धृत करके जवाब देते हैं: "भगवान विष्णु के पवित्र नाम का उच्चारण सोने या अन्य कीमती सामानों के चोर के लिए, शराबी के लिए, किसी मित्र या रिश्तेदार को धोखा देने वाले के लिए, किसी ब्राह्मण की हत्या करने वाले के लिए, या अपने गुरु या किसी अन्य श्रेष्ठ की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने वाले के लिए प्रायश्चित का सबसे अच्छा तरीका है। महिलाओं, राजा या उसके पिता की हत्या करने वाले, गायों का वध करने वाले और अन्य सभी पापी पुरुषों के लिए भी यह प्रायश्चित का सबसे अच्छा तरीका है। केवल भगवान विष्णु के पवित्र नाम का जप करने से, ऐसे पापी व्यक्ति परमेश्वर का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, जो तब यह सोचते हैं "क्योंकि इस व्यक्ति ने मेरे पवित्र नाम का जप किया है, मेरा कर्तव्य है कि मैं उसे सुरक्षा दूँ।'"

कोई पवित्र नाम का जप करके पापपूर्ण जीवन का प्रायश्चित कर सकता है और सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं को समाप्त कर सकता है, हालाँकि इसे प्रायश्चित नहीं कहा जाता है। साधारण प्रायश्चित अस्थायी रूप से एक पापी व्यक्ति की रक्षा कर सकता है, लेकिन यह उसके हृदय को पापपूर्ण कार्यों को करने की गहरी इच्छा से पूरी तरह से स्वच्छ नहीं करता है। इसलिए प्रायश्चित भगवान के पवित्र नाम के उच्चारण जितना शक्तिशाली नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति केवल एक बार पवित्र नाम का जप करे और पूरी तरह से प्रभु के चरण कमलों में समर्पण कर दे, तो प्रभु तुरंत उसे अपना वार्ड मानते हैं और हमेशा उसे सुरक्षा देने के लिए प्रेरित होते हैं। इसकी पुष्टि श्रीधर स्वामी करते हैं। इस प्रकार जब अजामिल यमराज के आज्ञा वाहकों द्वारा उठाए जाने के बड़े खतरे में था, तो प्रभु ने तुरंत उसकी सुरक्षा के लिए अपने व्यक्तिगत आज्ञा वाहकों को भेजा, और क्योंकि अजामिल सभी पापपूर्ण प्रतिक्रियाओं से मुक्त हो गया था, विष्णु दूतों ने उसकी ओर से बात की।

अजामिल ने अपने बेटे का नाम नारायण रखा था, और वह लड़के से बहुत प्यार करता था, वह उसे बार-बार बुलाता था। हालाँकि वह अपने बेटे को बुला रहा था, लेकिन नाम स्वयं शक्तिशाली था क्योंकि नारायण नाम सर्वोच्च भगवान नारायण से अलग नहीं है। जब अजामिल ने अपने बेटे का नाम नारायण रखा, उसके पापपूर्ण जीवन की सभी प्रतिक्रियाएँ समाप्त हो गईं, और जैसे-जैसे वह अपने बेटे को बुलाता रहा और इस तरह नारायण के पवित्र नाम का हजारों बार जप करते हुए, वह वास्तव में अनजाने में कृष्णभावना में प्रगति कर रहा था।

कोई तर्क दे सकता है, "जब वह लगातार नारायण के नाम का जाप कर रहा था, तो उसके लिए किसी वेश्या के साथ संबंध बनाना और शराब के बारे में सोचना कैसे संभव था?" अपने पापी कार्यों से वह बार-बार अपने ऊपर दुख ला रहा था, और इसलिए कोई कह सकता है कि अंततः नारायण का जाप करने से वह मुक्त हो पाया। हालाँकि, तब उसका जप नाम-अपराध होता तो। नम्नो बलाद यस्य हि पाप-बुद्धिः: जो पाप का कार्य करता रहता है और भगवान के पवित्र नाम का जाप करके अपने पापों को नष्ट करने का प्रयास करता है, वह नाम-अपराधी, पवित्र नाम का अपराधी है। इसके जवाब में यह कहा जा सकता है कि अजामिल का जप अपमानजनक नहीं था क्योंकि उसने अपने पापों का प्रतिकार करने के उद्देश्य से नारायण का नाम नहीं जपा था। उसे नहीं पता था कि वह पापी कार्यों का आदी है, न ही उसे पता था कि नारायण के नाम का उसका जाप उन्हें नष्ट कर रहा था। इस प्रकार उसने नाम-अपराध नहीं किया, और अपने बेटे को पुकारते हुए नारायण के पवित्र नाम का उसका बार-बार जप शुद्ध जाप कहा जा सकता है। इस शुद्ध जप के कारण, अजामिल ने अनजाने में भक्ति के फल जमा किए। वास्तव में, पवित्र नाम का उसका पहला उच्चारण भी उसके जीवन के सभी पापी प्रतिक्रियाओं को नष्ट करने के लिए पर्याप्त था। एक तार्किक उदाहरण देने के लिए, एक अंजीर का पेड़ तुरंत फल नहीं देता है, लेकिन समय के साथ फल मिलते हैं। इसी तरह, अजामिल की भक्ति धीरे-धीरे बढ़ी, और इसलिए यद्यपि उसने बहुत ही पापपूर्ण कार्य किए, लेकिन प्रतिक्रियाओं ने उसे प्रभावित नहीं किया। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई भगवान के पवित्र नाम का एक बार भी जप करता है, तो भूत, वर्तमान या भविष्य के पापपूर्ण जीवन की प्रतिक्रियाएं उसे प्रभावित नहीं करती हैं। एक और उदाहरण देने के लिए, यदि कोई सर्प के विषैले नुकीले को निकाल लेता है, तो यह सर्प के भविष्य के पीड़ितों को जहरीले प्रभावों से बचाता है, भले ही सर्प बार-बार काटे। इसी तरह, यदि कोई भक्त एक बार भी बिना किसी अपराध के पवित्र नाम का जप करता है, तो यह उसकी सदा रक्षा करता है। उसे बस समय के साथ जप के परिणामों के परिपक्व होने का इंतजार करना होगा।

 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध छह के अंतर्गत दूसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)