श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  6.2.42 
यर्ह्युपारतधीस्तस्मिन्नद्राक्षीत्पुरुषान् पुर: ।
उपलभ्योपलब्धान् प्राग्ववन्दे शिरसा द्विज: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
जब ब्राह्मण अजामिल की बुद्धि और मन भगवान् के स्वरूप पर स्थिर हो गया, तो उसने फिर से अपने सामने उन चार देवदूतों को देखा। वह समझ गया कि वे वही हैं जिन्हें उसने पहले देखा था, और इसलिए उसने उनके सामने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।
 
When the intellect and mind of Brahmin Ajamil became fixed on the form of God, he again saw those four divine men in front of him. He understood that these were the same people whom he had seen earlier, so he bowed down and saluted them.
तात्पर्य
जब अजामिल का मन भगवान के स्वरूप पर दृढ़ता से केन्द्रित हो गया तो उसे बचाने वाले विष्णुदूत फिर उसके सामने आये | कुछ समय के लिए विष्णुदूत चले गए थे ताकि अजामिल को भगवान के ध्यान में दृढ़ता से स्थिर होने का मौका मिले | अब जब उसकी भक्ति परिपक्व हो गई थी, वे उसे लेने लौट आए | यह समझ कर कि वे विष्णुदूत ही लौटे हैं, अजामिल ने उनके सामने प्रणाम किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)