श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.2.4 
यद्यदाचरति श्रेयानितरस्तत्तदीहते ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जनसमूह समाज में एक नेता के उदाहरण का अनुसरण करता है और उसके व्यवहार की नकल करता है। नेता जो भी स्वीकार करता है, उसे जनता प्रमाण के तौर पर मानती है।
 
The general public follows the example of the leader in the society and imitates his conduct. Whatever the leader believes, the public accepts it as evidence.
तात्पर्य
हालाँकि अजामिल दण्ड के भागी नहीं थे पर यमदूत यमराज जी द्वारा दंडित करने ले जाने की जिद्द पर अड़े थे। यह अधर्म था, धार्मिक नियमों के विरुद्ध था। विष्णुदूतों ने डरते हुए कहा कि यदि ऐसे अधार्मिक कार्य को अनुमति दी गयी तो मानव समाज का प्रबंधन बिगड़ जायेगा। आज के समय में, कृष्ण चेतना आंदोलन मानव समाज के लिए प्रबंधन के सही सिद्धांतों को लागू करने का प्रयास कर रहा है, पर दुर्भाग्यपूर्ण रूप से, कलीयुग की सरकारें हरे कृष्ण आंदोलन का ठीक तरह से समर्थन नहीं करती क्योंकि उन्हें इसका मूल्यवान योगदान नहीं दिखाई देता। हरे कृष्ण आंदोलन मानव समाज की गिरती अवस्था को सुधारने के लिए सही आंदोलन है, इसलिए दुनिया भर के सरकारों और नागरिकों को मानवता की पापमय अवस्था को ठीक करने के लिए इस आंदोलन को सहारा देना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)