श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  6.2.39 
इति जातसुनिर्वेद: क्षणसङ्गेन साधुषु ।
गङ्गाद्वारमुपेयाय मुक्तसर्वानुबन्धन: ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
भक्तों (विष्णुदूतों) से कुछ पल की मुलाकात के कारण अजामिल ने अपने मन को दृढ़ निश्चय के साथ भौतिक जीवन और शरीर से जोड़ने वाले विचारों से अलग कर लिया। इस प्रकार सभी भौतिक आकर्षणों से मुक्त होकर, उन्होंने तुरंत हरिद्वार की यात्रा शुरू कर दी।
 
Due to the brief association of the devotees (Vishnu's messengers), Ajamila deliberately separated his mind from the physical body and soul consciousness. Thus, freed from all material attractions, he immediately left for Hardwar.
तात्पर्य
मुक्त-सर्वानुबंधन शब्द दर्शाता है कि इस घटना के बाद अजामिल अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता न करते हुए आध्यात्मिक जीवन की प्रगति हेतु हार्दवार गये। हमारे कृष्ण चेतना आन्दोलन के केन्द्र वृन्दावन और नवद्वीप में हैं जिससे जो लोग सेवानिवृत्त जीवन जीना चाहते हैं, चाहे वे भक्त हो या न हो, वे वहाँ जा सकते हैं और दृढ़ता के साथ शारीरिक जीवन की अवधारणा का त्याग कर सकते हैं। पवित्र नाम का जाप करने और प्रसाद लेने की सरल विधि द्वारा सर्वोच्च सफलता प्राप्त करने के लिए कोई भी अपने जीवन के शेष दिन इन पवित्र स्थानों पर रहने का स्वागत है। इस प्रकार व्यक्ति अपने घर, भगवान के घर वापस लौट सकता है। हमारा हार्दवार में कोई केन्द्र नहीं है, परन्तु भक्तों के लिए वृन्दावन और श्रीधाम मायापुर अन्य पवित्र स्थानों से बेहतर हैं। चैतन्य चन्द्रोदय मंदिर भक्तों के साथ जुड़ने का एक अच्छा अवसर प्रदान करता है। हम सभी इस अवसर का लाभ उठायें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)