श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  6.2.38 
ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम् ।
धास्ये मनो भगवति शुद्धं तत्कीर्तनादिभि: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
चूँकि मैंने भक्तों की संगति में भगवान् के पवित्र नाम का केवल कीर्तन किया है, इसलिए मेरा हृदय अब शुद्ध हो रहा है। इसीलिए अब मैं भौतिक इन्द्रियों के झूठे आकर्षणों का शिकार नहीं बनूँगा। चूँकि अब मैं परम सत्य में स्थित हो चुका हूँ, इसलिए इसके बाद मैं शरीर के साथ अपनी पहचान नहीं रखूँगा। मैं "मैं" और "मेरा" के झूठे विचारों को त्यागकर अपना मन कृष्ण के चरणकमलों में स्थिर करूँगा।
 
Since I have simply chanted the holy name of the Lord in the association of devotees, my heart is now becoming pure. Therefore, I will no longer fall prey to the false attractions of material sense-gratification. Since I am now established in the Supreme Truth, I will no longer identify myself with the body. Giving up the false ideas of “I” and “mine,” I will fix my mind on the lotus feet of Krsna.
तात्पर्य
इस श्लोक में यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि कैसे एक जीव भौतिक परिस्थिति का शिकार हो जाता है। इसकी शुरुआत शरीर के साथ अपने आपको अनामित करना है। इसलिए भगवद्-गीता आध्यात्मिक शिक्षा के साथ शुरू होती है कि व्यक्ति शरीर नहीं है, बल्कि शरीर के अंदर है। यह चेतना तभी संभव हो सकती है जब कोई कृष्ण के पवित्र नाम, हरे कृष्ण महामंत्र का जप करे और हमेशा भक्तों की संगति में बना रहे। यह सफलता का रहस्य है। इसलिए हम जोर देकर कहते हैं कि व्यक्ति को भगवान के पवित्र नाम का जप करना चाहिए और खुद को इस भौतिक दुनिया के दूषणों से मुक्त रखना चाहिए, विशेष रूप से कामुक इच्छाओं, मांसाहारी, नशा और जुआ जैसे दूषणों से। दृढ़ संकल्प के साथ, व्यक्ति को इन सिद्धांतों का पालन करने की कसम खानी चाहिए और इस तरह भौतिक अस्तित्व की दयनीय स्थिति से बचना चाहिए। पहली आवश्यकता जीवन की शारीरिक अवधारणा से मुक्त होना है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)