श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.2.34 
क्‍व चाहं कितव: पापो ब्रह्मघ्नो निरपत्रप: ।
क्‍व च नारायणेत्येतद्भ‍गवन्नाम मङ्गलम् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
अजामिल बोला : मैं ऐसा ढीठ ठग हूँ जिसने अपनी ब्राह्मण संस्कृति की हत्या कर दी है। बेशक, मैं खुद पाप हूँ। भला मैं भगवान नारायण के पवित्र नाम के सर्वमंगलकारी जाप की बराबरी कैसे कर सकता हूँ?
 
Ajamila continued: I am such a shameless fraud who has killed my Brahmin culture. Indeed, I am sin personified. How can I be compared to the all-auspicious chanting of the holy name of Lord Narayana?
तात्पर्य
नारायण, कृष्ण के पवित्र नाम को कृष्ण भावना आंदोलन के माध्यम से प्रसारित करने वालों को हमेशा इस बात पर विचार करना चाहिए कि आने से पहले हमारी स्थिति क्या थी और अब क्या है। हम मांस खाने वाले, शराबी और स्त्री-शिकारी के रूप में घृणित जीवन में गिर गए थे, जो सभी प्रकार की पापपूर्ण गतिविधियों में लिप्त थे, लेकिन अब हमें हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने का अवसर दिया गया है। इसलिए हमें हमेशा इस अवसर की सराहना करनी चाहिए। भगवान की कृपा से हम कई शाखाएँ खोल रहे हैं, और हमें इस सौभाग्य का उपयोग प्रभु के पवित्र नाम का जाप करने और परमेश्वर भगवान की सीधे सेवा करने के लिए करना चाहिए। हमें अपनी वर्तमान और पिछली स्थितियों के बीच के अंतर के प्रति सचेत रहना चाहिए और हमेशा इस बात से बहुत सावधान रहना चाहिए कि सर्वोच्च जीवन से पतन न हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)