श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  6.2.24-25 
अजामिलोऽप्यथाकर्ण्य दूतानां यमकृष्णयो: ।
धर्मं भागवतं शुद्धं त्रैवेद्यं च गुणाश्रयम् ॥ २४ ॥
भक्तिमान् भगवत्याशु माहात्म्यश्रवणाद्धरे: ।
अनुतापो महानासीत्स्मरतोऽशुभमात्मन: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
यम और विष्णु के दूतों के बीच हुई बातचीत सुनकर अजामिल उन धार्मिक सिद्धांतों को समझ सका जो भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के अधीन कार्य करते हैं। ये सिद्धांत तीनों वेदों में बताए गए हैं। वह उन दिव्य धार्मिक सिद्धांतों को भी समझ सका जो भौतिक प्रकृति के गुणों से परे हैं और जो जीव और परम भगवान के बीच के संबंध से संबंधित हैं। इतना ही नहीं, अजामिल ने परम भगवान के नाम, यश, गुणों और लीलाओं का गुणगान सुना। इस तरह वह पूरी तरह से शुद्ध भक्त बन गया। तब उसे अपने पिछले पापों का स्मरण हुआ और उसे इस बात का बहुत पछतावा हुआ कि उसने ये पाप क्यों किए।
 
By listening to the conversations between the messengers of Yama and the messengers of Viṣṇu, Ajāmila could understand the religious principles that operate under the three modes of material nature. These principles are mentioned in the three Vedas. He could also understand the transcendental religious principles that are above the modes of material nature and that are related to the relationship between the living entity and the Supreme Personality of Godhead. Not only that, Ajāmila heard the glorification of the name, glory, qualities and pastimes of the Supreme Personality of Godhead. In this way, he became a completely pure devotee. Then he remembered his past sinful acts and felt great remorse as to why he had committed these sins.
तात्पर्य
भगवद्-गीता (٢.४५) में भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था:

त्रैगुण्य-विषया वेदा

निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन

निरद्वन्द्वो नित्य-सत्त्व-स्थो

निर्योग-क्षेम आत्मवान

"वेद मुख्य रूप से प्रकृति के तीन गुणों के विषय से निपटते हैं। हे अर्जुन इन गुणों से ऊपर उठो। इन सभी से परे हो जाओ। सभी द्वंद्वों और लाभ और सुरक्षा के लिए सभी चिंताओं से मुक्त हो जाओ और आत्म में स्थापित हो जाओ।" वैदिक सिद्धांत निश्चित रूप से आध्यात्मिक मंच पर उठने के लिए एक क्रमिक प्रक्रिया निर्धारित करते हैं, लेकिन अगर कोई वैदिक सिद्धांतों से जुड़ा रहता है, तो उसके आध्यात्मिक जीवन में ऊपर उठने का कोई मौका नहीं है। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन को भक्ति-भक्ति सेवा करने की सलाह दी, जो कि पारलौकिक धर्म की प्रक्रिया है। भक्ति सेवा की पारलौकिक स्थिति श्रीमद्-भागवतम (१.२.६) में भी पुष्टि की गई है।

स वैं पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे |

भक्ति, भक्ति सेवा, परो धर्मः है, पारलौकिक धर्म; यह भौतिक धर्म नहीं है। लोग आमतौर पर सोचते हैं कि भौतिक लाभ के लिए धर्म का पालन करना चाहिए। यह भौतिक जीवन में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखता है, उसे परो धर्मः, धार्मिक सिद्धांतों से जुड़ा होना चाहिए जिससे व्यक्ति सर्वोच्च भगवान का भक्त बन जाता है (यतो भक्तिरधोक्षजे)। भागवत धर्म सिखाता है कि भगवान और जीवित इकाई शाश्वत रूप से संबंधित हैं और जीवित इकाई का कर्तव्य भगवान के प्रति आत्मसमर्पण करना है। जब कोई भक्ति-भक्ति सेवा के मंच पर स्थित होता है, तो वह बाधाओं से मुक्त और पूरी तरह से संतुष्ट होता है (अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति)। उस मंच पर ऊपर उठने के बाद, अजामिल अपने भूतकाल की भौतिकवादी गतिविधियों के लिए विलाप करने लगा और सर्वोच्च भगवान के नाम, यश, रूप और लीलाओं का गुणगान करने लगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)