त्रैगुण्य-विषया वेदा
निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन
निरद्वन्द्वो नित्य-सत्त्व-स्थो
निर्योग-क्षेम आत्मवान
"वेद मुख्य रूप से प्रकृति के तीन गुणों के विषय से निपटते हैं। हे अर्जुन इन गुणों से ऊपर उठो। इन सभी से परे हो जाओ। सभी द्वंद्वों और लाभ और सुरक्षा के लिए सभी चिंताओं से मुक्त हो जाओ और आत्म में स्थापित हो जाओ।" वैदिक सिद्धांत निश्चित रूप से आध्यात्मिक मंच पर उठने के लिए एक क्रमिक प्रक्रिया निर्धारित करते हैं, लेकिन अगर कोई वैदिक सिद्धांतों से जुड़ा रहता है, तो उसके आध्यात्मिक जीवन में ऊपर उठने का कोई मौका नहीं है। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन को भक्ति-भक्ति सेवा करने की सलाह दी, जो कि पारलौकिक धर्म की प्रक्रिया है। भक्ति सेवा की पारलौकिक स्थिति श्रीमद्-भागवतम (१.२.६) में भी पुष्टि की गई है।
स वैं पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे |
भक्ति, भक्ति सेवा, परो धर्मः है, पारलौकिक धर्म; यह भौतिक धर्म नहीं है। लोग आमतौर पर सोचते हैं कि भौतिक लाभ के लिए धर्म का पालन करना चाहिए। यह भौतिक जीवन में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त हो सकता है, लेकिन जो व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में रुचि रखता है, उसे परो धर्मः, धार्मिक सिद्धांतों से जुड़ा होना चाहिए जिससे व्यक्ति सर्वोच्च भगवान का भक्त बन जाता है (यतो भक्तिरधोक्षजे)। भागवत धर्म सिखाता है कि भगवान और जीवित इकाई शाश्वत रूप से संबंधित हैं और जीवित इकाई का कर्तव्य भगवान के प्रति आत्मसमर्पण करना है। जब कोई भक्ति-भक्ति सेवा के मंच पर स्थित होता है, तो वह बाधाओं से मुक्त और पूरी तरह से संतुष्ट होता है (अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति)। उस मंच पर ऊपर उठने के बाद, अजामिल अपने भूतकाल की भौतिकवादी गतिविधियों के लिए विलाप करने लगा और सर्वोच्च भगवान के नाम, यश, रूप और लीलाओं का गुणगान करने लगा।
