श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.2.17 
तैस्तान्यघानि पूयन्ते तपोदानव्रतादिभि: ।
नाधर्मजं तद्‌धृदयं तदपीशाङ्‌घ्रिसेवया ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि तपस्या, दान, व्रत और ऐसी अन्य विधियों से पापमय जीवन के परिणामों को कम किया जा सकता है, लेकिन ये पुण्य कर्म किसी व्यक्ति के हृदय में मौजूद भौतिक इच्छाओं को जड़ से नहीं उखाड़ सकते। हालाँकि, यदि व्यक्ति ईश्वर के चरणकमलों की सेवा करता है, तो उसे इन सभी दोषों से तुरंत मुक्ति मिल जाती है।
 
Although the results of sinful life can be nullified by austerities, charity, vows and other methods, these pious activities cannot eliminate the material desires in one's heart. But if one serves the lotus feet of the Lord, he is immediately freed from all such contaminations.
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद् भागवतम में कहा गया है (11.2.42), भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्रा चा: भक्ति सेवा इतनी शक्तिशाली है कि जो भक्ति सेवा करता है वह तुरंत सभी पापपूर्ण इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। इस भौतिक संसार की सभी इच्छाएँ पापपूर्ण होती हैं क्योंकि भौतिक इच्छा का अर्थ इंद्रियों को तृप्ति प्रदान करना है जिसमें हमेशा कमोबेश पापपूर्ण कर्म निहित होते हैं। हालाँकि, शुद्ध भक्ति, अन्यभिलाषित -शून्य है; दूसरे शब्दों में, यह भौतिक इच्छाओं से मुक्त है, जो कर्म और ज्ञान से उत्पन्न होती हैं। जो भक्ति सेवा में स्थित होता है, उसकी भौतिक इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं और इसलिए वह पापमय जीवन से परे होता है। भौतिक इच्छाओं को पूर्ण रूप से रोक दिया जाना चाहिए। अन्यथा, यद्यपि एक व्यक्ति की तपस्या, कष्ट-सहन और दान कुछ समय के लिए उसे पाप से मुक्त कर सकता है फिर भी उसकी इच्छाएँ फिर से प्रकट होंगी क्योंकि उसका हृदय अशुद्ध होता है। इसलिए वह पाप से घृणा करेगा और कष्ट उठाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)