श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  6.2.16 
गुरूणां च लघूनां च गुरूणि च लघूनि च ।
प्रायश्चित्तानि पापानां ज्ञात्वोक्तानि महर्षिभि: ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
प्राधिकृत विज्ञ पंडितों और महर्षियों ने सावधानीपूर्वक यह निर्धारित किया है कि एक व्यक्ति को अपने भारी पापों का प्रायश्चित करने के लिए कठोर प्रायश्चित्त करना चाहिए और हल्के पापों का प्रायश्चित करने के लिए हल्का प्रायश्चित्त करना चाहिए। हालाँकि, हरे कृष्ण मंत्र का जाप किसी भी पाप के प्रभाव को नष्ट कर देता है, चाहे वह भारी हो या हल्का।
 
Authoritative learned scholars and sages have very carefully found out that a person should use a heavy method of atonement for the heaviest sins and a light method for atonement of light sins. But chanting Hare Krishna destroys the effects of all sins, whether heavy or light.
तात्पर्य
इस संबंध में, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर एक घटना का वर्णन करते हैं जो तब घटी जब सांब को कौरवों की सज़ा से बचाया गया था। सांब को दुर्योधन की बेटी से प्यार हो गया, और चूंकि क्षत्रिय रिवाज के अनुसार जब तक कोई अपनी क्षत्रिय वीरता नहीं दिखाता उसे क्षत्रिय की बेटी की पेशकश नहीं की जाती, सांब ने उसका अपहरण कर लिया। परिणामस्वरूप सांब को कौरवों ने गिरफ्तार कर लिया। बाद में, जब भगवान बलराम उसे बचाने आए, तो सांब की रिहाई के बारे में एक तर्क हुआ। चूंकि तर्क नहीं सुलझा, बलराम ने अपनी शक्ति इस तरह दिखाई कि हस्तिनापुर कांप गया और एक बड़े भूकंप की तरह नष्ट हो गया। फिर मामला सुलझा लिया गया, और सांब ने दुर्योधन की बेटी से शादी की। आशय यह है कि व्यक्ति को कृष्ण-बलराम, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की शरण लेनी चाहिए, जिसकी सुरक्षात्मक शक्ति इतनी महान है कि भौतिक दुनिया में उसकी बराबरी नहीं की जा सकती। किसी के पापों की प्रतिक्रियाएं कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हों, यदि कोई हरि, कृष्ण, बलराम या नारायण के नाम का जाप करता है, तो वे तुरंत नष्ट हो जाएंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)