येषां त्वन्ता गतं पापं
जनानां पुण्य-कर्मणाम्
ते द्वन्द्व-मोह-निर्मुक्त
भजन्ते मामृढ व्रताः
''जो व्यक्ति अपने पिछले और इस जीवन में पुण्य कर्म कर चुके हैं, जिनके पापकर्म पूरी तरह से मिट चुके हैं और जो भ्रम के द्वंद्व से मुक्त हो चुके हैं, वे दृढ़ निश्चय के साथ मेरी सेवा में संलग्न हो जाते हैं।'' जब तक कि कोई सभी पापकर्मों से मुक्त नहीं हो जाता, वह भक्ति सेवा के मंच पर पदोन्नत नहीं किया जा सकता। भगवद-गीता (8.5) में अन्यत्र कहा गया है:
अन्त काले च माम् एव
स्मरन मुक्त्वा कलेवरम्
यः प्रयाति स मद्भावम्
याति नास्त्यत्र संशयः
यदि कोई मृत्यु के समय कृष्ण, नारायण को याद करता है, तो वह निश्चित रूप से तुरंत घर लौटने, भगवान के पास वापस जाने का पात्र है।
