शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः
पुण्य-श्रवण-कीर्तनः
हृद्य अन्तः-स्थो ह्य भद्राणि
विधुनोति सुहृत् सताम्
"श्री कृष्ण, भगवान् का व्यक्तित्व, जो हर किसी के हृदय में परमात्मा [अतिआत्मा] और सच्चे भक्त के उपकारी हैं, भक्त के हृदय से भौतिक भोग की इच्छा को शुद्ध करते हैं जो ईमानदारी से सुने और जपे जाने पर स्वयं में गुणकारी उनके संदेशों का आनंद लेता है। यह सर्वोच्च भगवान की विशेष दया है कि जैसे ही उन्हें पता चलता है कि कोई उनके नाम, प्रसिद्धि और गुणों की महिमा कर रहा है, वे व्यक्तिगत रूप से किसी के हृदय से गंदगी साफ करने में मदद करते हैं। इसलिए केवल ऐसी महिमा से व्यक्ति न केवल शुद्ध होता है, बल्कि पवित्र गतिविधियों (पुण्य-श्रवण-कीर्तन) के परिणाम भी प्राप्त करता है। पुण्य-श्रवण-कीर्तन भक्ति सेवा की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। तब भी यदि कोई भगवान के नाम, लीला या गुणों का अर्थ नहीं समझता, तो केवल उन्हें सुनने या जपने से ही वह शुद्ध हो जाता है। ऐसे शोधन को सत्व-भावना कहा जाता है।
मानव जीवन में किसी का मुख्य उद्देश्य अपने अस्तित्व को शुद्ध करना और मुक्ति प्राप्त करना होना चाहिए। जब तक किसी के पास भौतिक शरीर होता है, तब तक उसे अशुद्ध समझा जाता है। ऐसी अशुद्ध, भौतिक स्थिति में, कोई वास्तव में आनंदित जीवन का आनंद नहीं ले सकता, यद्यपि हर कोई इसकी तलाश करता है। इसलिए श्रीमद्-भागवतम् (5.5.1) कहता है, तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत: अध्यात्म मंच पर आने के लिए किसी को अपने अस्तित्व को शुद्ध करने के लिए तप, तपस्या करनी चाहिए। भगवान के नाम, प्रसिद्धि और गुणों का नाम जपने और महिमा करने की तपस्या एक बहुत ही आसान शुद्धिकरण प्रक्रिया है जिससे हर कोई खुश हो सकता है। इसलिए जिस किसी को अपने हृदय की अंतिम सफाई की इच्छा है, उसे इस प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। अन्य प्रक्रियाएं, जैसे कि कर्म, ज्ञान और योग, हृदय को पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं कर सकते।
