श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 2: विष्णुदूतों द्वारा अजामिल का उद्धार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.2.12 
नैकान्तिकं तद्धि कृतेऽपि निष्कृते
मन: पुनर्धावति चेदसत्पथे ।
तत्कर्मनिर्हारमभीप्सतां हरे-
र्गुणानुवाद: खलु सत्त्वभावन: ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
धार्मिक ग्रंथों में बताए गए प्रायश्चित्त संबंधी कर्मकांड हृदय को पूरी तरह से स्वच्छ करने में अपर्याप्त होते हैं, क्योंकि प्रायश्चित्त के बाद भी व्यक्ति का मन फिर से भौतिक गतिविधियों की ओर दौड़ता है। इसलिए, जो व्यक्ति भौतिक कार्यों के फल-संबंधी कर्मों से मुक्ति चाहता है, उसके लिए हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन या भगवान के नाम, यश और लीलाओं की महिमा का वर्णन करना प्रायश्चित्त का सबसे उत्तम तरीका बताया गया है, क्योंकि इस तरह के कीर्तन से व्यक्ति के हृदय में जमी हुई गंदगी पूरी तरह से साफ हो जाती है।
 
The atonement rituals recommended in religious scriptures are insufficient to completely cleanse the heart, because after atonement one's mind again runs towards material activities. Consequently, for a person who wants to be free from the fruitive results of material activities, chanting the Hare Krishna mantra or singing the glories of the Lord's name, glory and pastimes is recommended as the most complete method of atonement, because such chanting cleanses the dirt accumulated in one's heart.
तात्पर्य
इस छंद का कथन श्रीमद्-भागवतम् (1.2.17) में पहले ही सत्यापित किया जा चुका है:

शृण्वतां स्व-कथाः कृष्णः

पुण्य-श्रवण-कीर्तनः

हृद्य अन्तः-स्थो ह्य भद्राणि

विधुनोति सुहृत् सताम्

"श्री कृष्ण, भगवान् का व्यक्तित्व, जो हर किसी के हृदय में परमात्मा [अतिआत्मा] और सच्चे भक्त के उपकारी हैं, भक्त के हृदय से भौतिक भोग की इच्छा को शुद्ध करते हैं जो ईमानदारी से सुने और जपे जाने पर स्वयं में गुणकारी उनके संदेशों का आनंद लेता है। यह सर्वोच्च भगवान की विशेष दया है कि जैसे ही उन्हें पता चलता है कि कोई उनके नाम, प्रसिद्धि और गुणों की महिमा कर रहा है, वे व्यक्तिगत रूप से किसी के हृदय से गंदगी साफ करने में मदद करते हैं। इसलिए केवल ऐसी महिमा से व्यक्ति न केवल शुद्ध होता है, बल्कि पवित्र गतिविधियों (पुण्य-श्रवण-कीर्तन) के परिणाम भी प्राप्त करता है। पुण्य-श्रवण-कीर्तन भक्ति सेवा की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। तब भी यदि कोई भगवान के नाम, लीला या गुणों का अर्थ नहीं समझता, तो केवल उन्हें सुनने या जपने से ही वह शुद्ध हो जाता है। ऐसे शोधन को सत्व-भावना कहा जाता है।

मानव जीवन में किसी का मुख्य उद्देश्य अपने अस्तित्व को शुद्ध करना और मुक्ति प्राप्त करना होना चाहिए। जब तक किसी के पास भौतिक शरीर होता है, तब तक उसे अशुद्ध समझा जाता है। ऐसी अशुद्ध, भौतिक स्थिति में, कोई वास्तव में आनंदित जीवन का आनंद नहीं ले सकता, यद्यपि हर कोई इसकी तलाश करता है। इसलिए श्रीमद्-भागवतम् (5.5.1) कहता है, तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत: अध्यात्म मंच पर आने के लिए किसी को अपने अस्तित्व को शुद्ध करने के लिए तप, तपस्या करनी चाहिए। भगवान के नाम, प्रसिद्धि और गुणों का नाम जपने और महिमा करने की तपस्या एक बहुत ही आसान शुद्धिकरण प्रक्रिया है जिससे हर कोई खुश हो सकता है। इसलिए जिस किसी को अपने हृदय की अंतिम सफाई की इच्छा है, उसे इस प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। अन्य प्रक्रियाएं, जैसे कि कर्म, ज्ञान और योग, हृदय को पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं कर सकते।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)