यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिमौजसा ।
जुष्ट ईश गुणै: सर्वैस्ततोऽसि भगवान् प्रभु: ॥ ५ ॥
अनुवाद
हे प्रभु! आप के असीम दया, सभी सम्पत्तियों, समस्त शक्तियाँ और सभी महिमा, शक्ति और दिव्य गुणों से युक्त होने के कारण प्रत्येक प्राणी के स्वामी पूर्ण भगवान हैं।
O Lord! You are the Supreme Personality of Godhead, the master of everyone, because you are endowed with causeless grace, all opulence, all brilliance and glory, power and transcendental qualities.
तात्पर्य
इस श्लोक में tato ’si bhagavān prabhuḥ शब्दों का अर्थ है "इसलिए आप भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, सभी के स्वामी हैं।" भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सभी छह ऐश्वर्यों से पूर्ण रूप से संपन्न है, और इसके अलावा वह अपने भक्त के प्रति अत्यंत दयालु है। यद्यपि वे स्वयं में पूर्ण हैं, फिर भी वे चाहते हैं कि सभी जीव उनका समर्पण करें ताकि वे उनकी सेवा में जुड़ सकें। इस प्रकार वह संतुष्ट हो जाते हैं। यद्यपि वे स्वयं में पूर्ण हैं, फिर भी जब उनका भक्त उन्हें भक्ति में पत्त्रं पुष्पं फलं तोयम — एक पत्ता, फूल, फल या पानी — अर्पित करता है तो वे प्रसन्न हो जाते हैं। कभी-कभी भगवान, माता यशोदा के बच्चे के रूप में, अपने भक्त से भोजन मांगते हैं, जैसे कि वे बहुत भूखे हों। कभी-कभी वह अपने भक्त को स्वप्न में बताते हैं कि उनका मंदिर और उनका बगीचा अब बहुत पुराना हो गया है और वह उनका अच्छी तरह से आनंद नहीं ले सकते। इस प्रकार वह भक्त से उनके मरम्मत का अनुरोध करते हैं। कभी-कभी वह पृथ्वी में दबे होते हैं, और जैसे कि स्वयं बाहर निकलने में असमर्थ हों, वह अपने भक्त से उन्हें बचाने का अनुरोध करते हैं। कभी-कभी वह अपने भक्त से दुनिया भर में उनकी महिमा का प्रचार करने का अनुरोध करते हैं, यद्यपि वह अकेले ही इस कार्य को करने में सक्षम हैं। यद्यपि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व सभी संपत्ति से संपन्न है और आत्मनिर्भर है, फिर भी वह अपने भक्तों पर निर्भर है। इसलिए भगवान का अपने भक्तों के साथ संबंध अत्यंत गोपनीय है। केवल भक्त ही समझ सकता है कि कैसे भगवान, यद्यपि अपने आप में पूर्ण हैं, किसी विशेष कार्य के लिए अपने भक्त पर निर्भर करते हैं। भगवद-गीता (11.33) में इसका वर्णन किया गया है, जहाँ भगवान अर्जुन से कहते हैं, निमित्त-मात्रं भव सव्यसाचिन: "हे अर्जुन, युद्ध में केवल एक साधन बनो।" भगवान कृष्ण में कुरुक्षेत्र की लड़ाई जीतने की क्षमता थी, लेकिन फिर भी उन्होंने अपने भक्त अर्जुन को लड़ने और जीत का कारण बनने के लिए प्रेरित किया। श्री चैतन्य महाप्रभु पूरी दुनिया में अपना नाम और मिशन फैलाने में काफी सक्षम थे, लेकिन फिर भी उन्होंने यह काम करने के लिए अपने भक्त पर निर्भर रहे। इन सभी बिंदुओं पर विचार करने पर सर्वोच्च भगवान की आत्मनिर्भरता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह अपने भक्तों पर निर्भर करते हैं। इसे उनकी अकारण दया कहा जाता है। वह भक्त जिसने साक्षात्कार द्वारा भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की इस अकारण दया को समझा है, स्वामी और सेवक को समझ सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥