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श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  6.18.64 
मा भैष्ट भ्रातरो मह्यं यूयमित्याह कौशिक: ।
अनन्यभावान् पार्षदानात्मनो मरुतां गणान् ॥ ६४ ॥
 
 
अनुवाद
जब इन्द्र ने देखा कि वे वास्तव में उसके समर्पित भक्त थे, तो उसने उनसे कहा: यदि तुम मेरे सगे भाई हो, तो तुम्हारे लिए डर की कोई बात नहीं है।
 
When Indra saw that they were really his devoted followers, he told them that if you are really my brothers then you need not be afraid of me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)