श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  6.18.59 
नाध्यगच्छद्‌व्रतच्छिद्रं तत्परोऽथ महीपते ।
चिन्तां तीव्रां गत: शक्र: केन मे स्याच्छिवं त्विह ॥ ५९ ॥
 
 
अनुवाद
हे जगदम्बा! जब इंद्र को कोई दोष नहीं मिला, तब उसने सोचा, अब मेरा भला कैसे होगा? इस प्रकार वह अत्यंत चिंतित हो गया।
 
O Vishweshwara! When Indra could not find any fault, he thought, how can I be saved now? Thus he got immersed in deep worry.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)