श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 18: राजा इन्द्र का वध करने के लिए दिति का व्रत  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  6.18.39 
अहो अर्थेन्द्रियारामो योषिन्मय्येह मायया ।
गृहीतचेता: कृपण: पतिष्ये नरके ध्रुवम् ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
कश्यप मुनि मन ही मन सोच रहे थे कि मैं अब सांसारिक भोगों में बहुत अधिक आसक्त हो गया हूँ, इसका लाभ उठाकर भगवान की माया ने मुझे स्त्री (मेरी पत्नी) के रूप में भ्रमित कर दिया है। इसलिए अब मैं निश्चित रूप से एक पापी हूँ और अवश्य ही नरक में जाऊँगा।
 
Sage Kasyapa thought, Oh! I have now become very attached to material pleasures. So taking advantage of this opportunity, my mind has been attracted to the form of a woman (my wife) by the Maya of Sri Bhagavan. Therefore, I am very lowly and will certainly go to hell.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)