श्रीसूत उवाच
तद्विष्णुरातस्य स बादरायणि-
र्वचो निशम्यादृतमल्पमर्थवत् ।
सभाजयन् सन्निभृतेन चेतसा
जगाद सत्रायण सर्वदर्शन: ॥ २२ ॥
अनुवाद
श्री सूत गोस्वामी ने कहा- हे महर्षि शौनक! महाराज परीक्षित को आवश्यक विषयों पर विनम्रतापूर्वक और संक्षेप में बोलते देख, हर चीज के जानकार शुकदेव गोस्वामी ने उनके प्रयासों की सराहना की और इस प्रकार उत्तर दिया।
Sri Suta Goswami said—O Maharishi Shaunak! Hearing Maharaja Pariksit speaking politely and briefly on important topics, the omniscient Sukadeva Goswami praised his efforts and replied as follows.
तात्पर्य
महाराज परीक्षित के प्रश्न की शुकादेव गोस्वामी ने बहुत सराहना की क्योंकि यद्यपि यह प्रश्न बहुत कम शब्दों में था, किन्तु इसमें सार्थक प्रश्न था कि कैसे दिति के पुत्र राक्षस होते हुए देवता बन गये। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि यद्यपि दिति बहुत ईर्ष्यालु थी, पर अपने भक्ति भाव के कारण उसका हृदय शुद्ध था। एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यद्यपि कश्यप मुनि विद्वान विप्र थे और आध्यात्मिक चेतना में उच्च थे, फिर भी वे अपनी सुन्दर पत्नी के प्रलोभन का शिकार हो गये। ये सभी प्रश्न बहुत कम शब्दों में पूछे गये थे, अतः शुकादेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित के प्रश्न की अत्यधिक सराहना की।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥