भक्तिं भूतिं हरिर् दत्त्वा
स्व-विच्छेदानुभूतये
देव्याः शापेन वृत्रत्वं
नीत्वा तं स्वान्तिकेऽनयत्
आशय यह है कि भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व चाहते थे कि चित्रकेतु को जल्द से जल्द वैकुण्ठलोक ले आया जाए। भगवान की योजना थी कि पार्वती चित्रकेतु को शाप दें कि वे वृत्रासुर बन जाएँ ताकि अपने अगले जन्म में वे जल्द से घर लौट सकें, भगवान के पास। ऐसे कई उदाहरण रहे हैं जिनमें एक भक्त जो राक्षस के रूप में काम कर रहा है, भगवान की दया से भगवान के राज्य में लाया गया है। पार्वती का भगवान शिव द्वारा आलिंगन किया जाना पति और पत्नी के बीच के संबंध में स्वाभाविक था; यह चित्रकेतु के देखने के लिए कुछ असाधारण नहीं था। फिर भी, चित्रकेतु उस स्थिति में भगवान शिव को देखकर ज़ोर से हँसे, भले ही उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। इस प्रकार उन्हें अंततः शाप दिया गया, और यह शाप उनके घर लौटने, भगवान के पास लौटने का कारण था।
