श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  6.17.30 
अविवेककृत: पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि ।
गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्रजिवत्कृत: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
जैसे कोई व्यक्ति भूलवश फूलों की माला को सांप समझ लेता है या सपने में सुख और दुख का अनुभव करता है, उसी प्रकार भौतिक दुनिया में, पर्याप्त विचार न करने के कारण, हम सुख और दुख के बीच अंतर करते हैं, एक को अच्छा और दूसरे को बुरा मानते हैं।
 
Just as a man mistakes a garland of flowers for a snake or experiences pleasure and pain in his dreams, similarly in the material world, due to lack of good thinking, we differentiate between pleasure and pain, considering one as good and the other as bad.
तात्पर्य
भौतिक द्वंद्वात्मक संसार में ख़ुशी और दुख दोनों ही ग़लत अवधारणाएं हैं। चैतन्य-चरितामृत (अंत्य 4.176) में कहा गया है:

"द्वैते" भद्र-अभद्र-ज्ञान, सब - "मनोधर्म"

"एई भाला, एई मंदा" - एई सब "भ्रम"

द्वैत के भौतिक संसार में ख़ुशी और दुख के बीच का अंतर मात्र मानसिक उहापोह है, क्योंकि सांकेतिक रूप से ख़ुशी और दुख वास्तव में एक ही हैं। वे सपनों में ख़ुशी और दुख की तरह हैं। एक सोता हुआ आदमी सपने देखकर अपनी ख़ुशी और दुख का निर्माण करता है, यद्यपि वास्तव में उनका कोई अस्तित्व नहीं होता।

इस पद्य में दिया गया अन्य उदाहरण है कि एक फूलमाला मूल रूप से बहुत सुंदर होती है, लेकिन ग़लती से, परिपक्व ज्ञान की कमी के कारण, कोई इसे सांप समझ सकता है। इस संबंध में प्रबोधानंद सरस्वती का एक कथन है: विश्वं पूर्ण-सुखायते। इस भौतिक संसार में हर कोई दयनीय परिस्थितियों से परेशान है, लेकिन श्रील प्रबोधानंद सरस्वती कहते हैं कि यह दुनिया ख़ुशियों से भरी पड़ी है। यह कैसे संभव है? वे जवाब देते हैं, यत्-कारुण्य-कटाक्ष-वैभववतां तं गौरं एव स्तुमः। एक भक्त इस भौतिक संसार के कष्टों को केवल श्री चैतन्य महाप्रभु की निस्वार्थ दया के कारण ही ख़ुशी के रूप में स्वीकार करता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने व्यक्तिगत व्यवहार से दिखाया कि वे कभी भी व्यथित नहीं थे, बल्कि हरि कृष्ण महामंत्र का जाप करते हुए हमेशा प्रसन्न रहते थे। श्री चैतन्य महाप्रभु के पदचिह्नों पर चलना चाहिए और लगातार महामंत्र का जाप करना चाहिए - हरि कृष्ण, हरि कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरि हरे / हरि राम, हरि राम, राम राम, हरि हरे। कोई कभी भी द्वैत के संसार के कष्टों को महसूस नहीं करेगा। कोई व्यक्ति जीवन की किसी भी स्थिति में ख़ुश रहेगा यदि वह प्रभु के पवित्र नाम का जाप करेगा।

सपनों में हम कभी-कभी मीठे चावल खाने का आनंद लेते हैं और कभी-कभी दुखी होते हैं जैसे कि हमारे किसी प्रिय परिवार के सदस्य की मृत्यु हो गई हो। क्योंकि एक ही मन और शरीर द्वैत के भौतिक संसार में हमारे जागने के समय भी मौजूद रहते हैं, इस कथित संसार की ख़ुशी और दुखी होने से बेहतर सपनों की झूठी, सतही ख़ुशी नहीं है। मन सपनों और जागने दोनों में माध्यम होता है, और स्वीकृति और अस्वीकृति की शर्तों में मन द्वारा निर्मित हर चीज़, संकल्प और विकल्प, मनोधर्म कहलाता है, या मानसिक अवधारणा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)