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bhagavat 6.17.22: पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कोई भेदभाव नहीं रखते, इसलिए उनके लिए कोई विशेष मित्र नहीं है, कोई विशेष शत्रु नहीं है, और कोई विशेष संबंधी नहीं है। ऐसी स्थिति में, किसी के प्रति उनका विशेष लगाव नहीं है और न ही कोई विशेष नफरत है। भगवान् सांसारिक सुख-दुख से परे हैं, इसलिए उन्हें सुख से मोह नहीं है और न ही दुख से घृणा है। सुख और दुख आपेक्षिक हैं, लेकिन भगवान हमेशा आनंदित रहते हैं, इसलिए उनके लिए दुख का कोई मतलब नहीं है।   |   bhagavat अध्याय 6.17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  6.17.22 
न तस्य कश्चिद्दयित: प्रतीपो
न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्व: ।
समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य
सुखे न राग: कुत एव रोष: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कोई भेदभाव नहीं रखते, इसलिए उनके लिए कोई विशेष मित्र नहीं है, कोई विशेष शत्रु नहीं है, और कोई विशेष संबंधी नहीं है। ऐसी स्थिति में, किसी के प्रति उनका विशेष लगाव नहीं है और न ही कोई विशेष नफरत है। भगवान् सांसारिक सुख-दुख से परे हैं, इसलिए उन्हें सुख से मोह नहीं है और न ही दुख से घृणा है। सुख और दुख आपेक्षिक हैं, लेकिन भगवान हमेशा आनंदित रहते हैं, इसलिए उनके लिए दुख का कोई मतलब नहीं है।
 
The Supreme Personality of Godhead sees all living entities as the same; therefore, no one is dear to Him, no one is His enemy; neither is any friend nor any relative. Being detached from this material world, He has no love for so-called happiness, nor any hatred for misery. Happiness and misery are relative. The Lord is always happy, so misery has no meaning for Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)