श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 17: माता पार्वती द्वारा चित्रकेतु को शाप  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  6.17.2-3 
स लक्षं वर्षलक्षाणामव्याहतबलेन्द्रिय: ।
स्तूयमानो महायोगी मुनिभि: सिद्धचारणै: ॥ २ ॥
कुलाचलेन्द्रद्रोणीषु नानासङ्कल्पसिद्धिषु ।
रेमे विद्याधरस्त्रीभिर्गापयन् हरिमीश्वरम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
महान साधुओं, मुनियों और सिद्धलोक व चारणलोक के समस्त वासियों द्वारा श्रद्धा प्राप्त, अत्यंत पराक्रमी योगी चित्रकेतु लाखों वर्षों तक आनंद-मय जीवन व्यतीत करता रहा। अपक्षयी शरीर और इंद्रियों के साथ, वह सुमेरु पर्वत की घाटियों में विचरण करता रहा, वह स्थान जो विविध योग शक्तियों के सिद्ध होने का स्थल है। उन घाटियों में उसने भगवान हरि की महिमा का जप करते हुए विद्याधरलोक की रमणियों के साथ जीवन का आनंद भोगा।
 
The most powerful Yogi, Chitraketu, admired by the great sages and munis and the inhabitants of Siddhaloka and Charanaloka, roamed about for millions of years, enjoying life. Without losing his physical strength and senses, he roamed in the valleys of Mount Sumeru, the place where various kinds of yogic powers were perfected. Chanting the glories of Lord Hari, he enjoyed life with the ladies of Vidyadharloka.
तात्पर्य
यह समझना चाहिए कि महाराजा चित्रकेतु यद्यपि विद्याधर-लोक की सुंदर स्त्रियों से घिरे हुए थे परंतु भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण करके भगवान का यशोगान करना नहीं भूले। अनेक स्थानों पर यह सिद्ध हुआ है कि जो भगवान के यशोगान में तल्लीन भाव से लिप्त रहने वाले शुद्ध भक्त हैं, वे किसी भी भौतिक परिस्थिति से दूषित नहीं होते और उन्हें पूर्ण समझा जाना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)