कृष्ण-बाहिर्मुख हाँ भोग वाँछा करे
निकट-स्थ माया तारे जापटिया धरे
जैसे ही कोई जीव अपना संवैधानिक पद भूल जाता है और सर्वोच्च के साथ एक होने का प्रयास करता है, उसका सशर्त जीवन शुरू होता है। यह अवधारणा कि सर्वोच्च ब्रह्म और जीव न केवल गुणवत्ता में बल्कि मात्रा में भी समान हैं, सशर्त जीवन का कारण है। यदि कोई सर्वोच्च भगवान और जीव के बीच के अंतर को भूल जाता है, तो उसका सशर्त जीवन शुरू होता है। सशर्त जीवन का मतलब एक शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर स्वीकार करना है और फिर से मृत्यु को स्वीकार करने के लिए मृत्यु को स्वीकार करना है। मायावादी दार्शनिक तत्वम् असि के दर्शन को सिखाते हुए कहते हैं, "तुम भगवान के समान हो।" वह भूल जाता है कि तत्त्वम् असि जीव के सीमांत स्थिति के संदर्भ में लागू होता है, जो धूप की तरह है। सूरज में गर्मी और रोशनी होती है, और धूप में गर्मी और रोशनी होती है, और इस प्रकार वे गुणात्मक रूप से एक होते हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि धूप सूरज पर टिकी होती है। जैसा कि भगवान ने भगवद-गीता में कहा है, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाह्म: "मैं ब्रह्म का मूल स्रोत हूँ।" सूरज की ग्लोब की उपस्थिति के कारण धूप महत्वपूर्ण है। ऐसा नहीं है कि सूर्य ग्लोब धूप की सर्वव्यापकता के कारण महत्वपूर्ण है। इस तथ्य को भूलना और गलत समझना माया कहलाता है। अपनी संवैधानिक स्थिति और सर्वोच्च भगवान के भूलने के कारण, माया या संसार में आ जाता है - सशर्त जीवन। इस संबंध में, माधवाचार्य कहते हैं:
सर्व-भिन्नम् परात्मानम्
विस्मरन संसारे इह
अभिन्नम् संस्मरन् याति
तमो नास्त्यत्र संशयः
जब कोई सोचता है कि जीव हर तरह से सर्वोच्च भगवान से अलग नहीं है, तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह अज्ञान (तमो) में है।
