इस भौतिक जगत में बद्धजीव, जिसे वह सुख के साधनों से भरा हुआ समझता है, यह सोचकर विस्तार करता है कि वही इस जगत का भोक्ता है। इसी तरह भौतिक जगत जीवात्मा के सुख के साधन के रूप में विस्तार करता है। इस प्रकार दोनों ही विस्तार करते हैं, लेकिन दोनों ही मेरी शक्तियाँ होने के कारण मुझसे जुड़े हुए हैं। परमेश्वर होने के कारण मैं इन प्रभावों का कारण हूँ, और मनुष्य को यह जानना चाहिए कि ये दोनों ही मुझमें व्याप्त हैं।
The conditioned soul expands in this material world, which he considers to be full of means of pleasure, thinking that he is the enjoyer of this world. Similarly, this material world expands as a means of the soul's pleasure. Thus both expand, but both are united with Me because they are My potencies. As the Supreme Lord, I am the cause of these results, and man should know that both are pervaded by Me.
तात्पर्य
मायावाद दर्शन सभी वस्तुओं को ईश्वर या परब्रह्म के गुणों के समान देखता है और इसलिए सभी वस्तुओं को पूजनीय मानता है। मायावाद सम्प्रदाय का यह खतरनाक सिद्धांत है जिसने सामान्य लोगों को नास्तिकता की ओर मोड़ दिया है। इस सिद्धांत के आधार पर व्यक्ति सोचता है कि वह ईश्वर है जबकि यह सत्य नहीं है। जैसे कि भगवद् गीता में कहा गया है (मया ततं इदं सर्वं जगद् अव्यक्त मूर्तिना), सत्य यह है कि समस्त ब्रह्माण्डीय प्रकटता ईश्वर की ऊर्जाओं का ही विस्तार है, जो भौतिक तत्वों और जीवों में प्रकट होती हैं। जीव, भौतिक तत्वों को गलत तरीके से अपने भोग के संसाधन मानते हैं और वे स्वयं को भोगी मानते हैं। किंतु उन दोनों में से कोई भी स्वतंत्र नहीं है; दोनों ही प्रभु की ऊर्जाएँ हैं। भौतिक ऊर्जा और आध्यात्मिक ऊर्जा का मूल कारण ईश्वर है। हालाँकि ईश्वर की ऊर्जाओं का विस्तार ही मूल कारण है, किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि प्रभु स्वयं ही विभिन्न तरीकों से विस्तारित हुए हैं। मायावादियों के सिद्धांतों की निंदा करने के लिए प्रभु स्पष्ट रूप से भगवद् गीता में कहते हैं, मत्स्था नि सर्वभूतानि, न चाहं तेस्ववस्थितः : "सभी प्राणी मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं हूँ।" सब कुछ उन्हीं पर टिका है और सब कुछ उनकी ऊर्जाओं का ही विस्तार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु स्वयं की तरह सभी वस्तुएँ पूजनीय हैं। भौतिक विस्तार अस्थायी है, लेकिन प्रभु अस्थायी नहीं हैं। जीव प्रभु के अंग हैं, लेकिन वे स्वयं प्रभु नहीं हैं। इस भौतिक संसार में जीव अकल्पनीय नहीं हैं, लेकिन प्रभु हैं। यह सिद्धांत कि प्रभु की ऊर्जाएँ, प्रभु का ही विस्तार होने के कारण, उतनी ही अच्छी हैं जितना स्वयं प्रभु, ग़लत है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥