श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  6.16.50 
श्रीभगवानुवाच
यन्नारदाङ्गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम् ।
संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
भगवान अनंतादेव ने उत्तर दिया- राजन! परम साधु नारद तथा अंगिरा द्वारा मेरे संबंध में दिये गये उपदेशों को अंगीकार करने के फलस्वरूप तुम दिव्य ज्ञान से भलीभाँति अवगत हो चुके हो। आध्यात्मिक ज्ञान से शिक्षित हो जाने पर अब तुमने मेरा साक्षात् दर्शन किया है। अत: तुम अब पूर्ण हो चुके हो।
 
Lord Ananta Deva replied thus: O King! As a result of accepting the teachings given by the great sages Narada and Angira regarding me, you have become well acquainted with the divine knowledge. Being educated in spiritual knowledge, you have now seen me in person, hence you are now completely perfected.
तात्पर्य
जीवन की परिपूर्णता आध्यात्मिक रूप से शिक्षित होना और प्रभु के अस्तित्व को और कैसे उन्होंने लौकिक अभिव्यक्ति को बनाया, बनाए रखा और उसका उन्मूलन किया यह समझना है। जब कोई ज्ञान में परिपूर्ण होता है, तो वह नारद और अंगिरा जैसे उत्तम व्यक्तियों और उनकी शिष्य परंपरा के सदस्यों के संग से परमात्मा के प्रेम को विकसित कर सकता है। तब वह असीमित परम भगवान को आमने-सामने देख पाता है। यद्यपि भगवान असीमित हैं, पर अपनी कारणहीन दया से वे भक्त को दिखाई देते हैं, जो तब उन्हें देख पाता है। सशर्त जीवन की हमारी वर्तमान स्थिति में हम परम भगवान को न तो देख सकते हैं और न ही समझ सकते हैं।

अतः श्री-कृष्ण-नामादि

न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः

सेवनमुखे हि जिह्वादौ

स्वयं एव स्फुरत्यदः

"कोई भी भगवान श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की दिव्य प्रकृति को अपनी भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों से समझ नहीं सकता। परमेश्वर की दिव्य नाम, रूप, गुण और लीलाएँ केवल तभी प्रकट होती हैं जब कोई भगवान की दिव्य सेवा में आध्यात्मिक रूप से संतृप्त हो जाता है।" (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.234) यदि कोई नारद मुनि या उनके प्रतिनिधि के निर्देशन में साधना जीवन लेता है और इस तरह खुद को भगवान की सेवा में लगाता है, तो वह खुद को भगवान को आमने-सामने देखने के योग्य बनाता है। ब्रह्म-संहिता (5.38) कहती है:

प्रेमांजन-च्युरिता-भक्ति-विलोचनेन

संतः सदैव हृदयेषु विलोकयंति

यम् अयामसुंदरम् अचिंत्य-गुण-स्वरूपम्

गोविंदम् आदि पुरुषम् तम अहम् भजामी

"मैं परम प्रभु गोविंद की पूजा करता हूँ, जो हमेशा उस भक्त के द्वारा देखा जाता है जिसकी आँखों में प्रेम लिपटा हुआ है। वह भक्त के हृदय में स्थित अपने श्यामसुंदर के शाश्वत रूप में देखा जाता है।" आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार व्यक्ति योग्य बन जाता है और बाद में परम भगवान को देखता है, जैसा कि महाराज चित्रकेतु से प्रमाणित होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)