अतः श्री-कृष्ण-नामादि
न भवेद् ग्राह्यम इंद्रियैः
सेवनमुखे हि जिह्वादौ
स्वयं एव स्फुरत्यदः
"कोई भी भगवान श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की दिव्य प्रकृति को अपनी भौतिक रूप से दूषित इंद्रियों से समझ नहीं सकता। परमेश्वर की दिव्य नाम, रूप, गुण और लीलाएँ केवल तभी प्रकट होती हैं जब कोई भगवान की दिव्य सेवा में आध्यात्मिक रूप से संतृप्त हो जाता है।" (भक्ति-रसामृत-सिंधु 1.2.234) यदि कोई नारद मुनि या उनके प्रतिनिधि के निर्देशन में साधना जीवन लेता है और इस तरह खुद को भगवान की सेवा में लगाता है, तो वह खुद को भगवान को आमने-सामने देखने के योग्य बनाता है। ब्रह्म-संहिता (5.38) कहती है:
प्रेमांजन-च्युरिता-भक्ति-विलोचनेन
संतः सदैव हृदयेषु विलोकयंति
यम् अयामसुंदरम् अचिंत्य-गुण-स्वरूपम्
गोविंदम् आदि पुरुषम् तम अहम् भजामी
"मैं परम प्रभु गोविंद की पूजा करता हूँ, जो हमेशा उस भक्त के द्वारा देखा जाता है जिसकी आँखों में प्रेम लिपटा हुआ है। वह भक्त के हृदय में स्थित अपने श्यामसुंदर के शाश्वत रूप में देखा जाता है।" आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार व्यक्ति योग्य बन जाता है और बाद में परम भगवान को देखता है, जैसा कि महाराज चित्रकेतु से प्रमाणित होता है।
