बन्धुज्ञात्यरिमध्यस्थमित्रोदासीनविद्विष: ।
सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथ: ॥ ५ ॥
अनुवाद
इस भौतिक जगत में, जो एक ऐसी नदी की तरह बहता है जो जीवित प्राणी को बहा ले जाती है, सभी लोग समय के साथ मित्र, रिश्तेदार और दुश्मन बन जाते हैं। वे उदासीनता से भी काम करते हैं, वे मध्यस्थता करते हैं, वे एक-दूसरे से घृणा करते हैं, और वे कई अन्य रिश्तों में काम करते हैं। इतना सब होने के बाद भी कोई भी किसी से स्थायी रूप से जुड़ा नहीं है।
This material world flows like a river, carrying its living souls along with it and all people become friends, relatives and enemies as and when required. They act as indifferent, mediators, haters and in many other ways. Yet no one is permanently attached to anyone.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में हमारा यह व्यवहारिक अनुभव है कि जो व्यक्ति आज हमारा मित्र है, वह कल हमारा शत्रु बन जाता है। हमारी मित्रता या शत्रुता, पारिवारिक व्यक्ति या बाहरी व्यक्ति के रूप में संबंध, वास्तव में हमारे विभिन्न व्यवहारों का परिणाम हैं। चित्रकेतु महाराज अपने पुत्र के लिए विलाप कर रहे थे, जो अब मर चुका था, परन्तु वह परिस्थिति पर दूसरे दृष्टिकोण से विचार कर सकते थे। "यह जीव," उन्होंने सोचा होगा, "मेरे पिछले जन्म में मेरा शत्रु था, और अब, मेरे पुत्र के रूप में प्रकट होकर, वह समय से पहले मुझे पीड़ा और व्यथा देने के लिए ही जा रहा है।" उन्हें अपने मृत पुत्र को अपने पूर्व शत्रु के रूप में क्यों नहीं मानना चाहिए और विलाप करने के बजाय, शत्रु की मृत्यु के कारण जुबिलेंट होना चाहिए ? जैसा कि भगवद्-गीता (3.27) में कहा गया है, प्रकृतेः क्रियामाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः: वास्तव में सब कुछ भौतिक प्रकृति के गुणों के साथ हमारे जुड़ाव के कारण ही हो रहा है। इसलिए जो व्यक्ति गुणवत्तापूर्ण व्यवहार में सहयोग के साथ आज मेरा मित्र है, वह कल जुनून और अज्ञानता के तरीकों के सहयोग से मेरा शत्रु हो सकता है। जैसे ही भौतिक प्रकृति के तरीके काम करते हैं, भ्रम में हम दूसरों को दोस्ती, दुश्मनी, पुत्र या पिता के रूप में अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग व्यवहारों की प्रतिक्रिया के संदर्भ में स्वीकार करते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥