श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  6.16.42 
क: क्षेमो निजपरयो:
कियान्वार्थ: स्वपरद्रुहा धर्मेण ।
स्वद्रोहात्तव कोप:
परसम्पीडया च तथाधर्म: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार का धर्म, जिससे स्वयं के साथ-साथ अन्य लोगों में भी ईर्ष्या पैदा होती है, किस प्रकार से स्वयं और उन लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है? इस तरह के धर्म का अभ्यास करके क्या अच्छा हो सकता है? आखिरकार इससे क्या हासिल होगा? अपने प्रति ईर्ष्या के चलते और दूसरों को तकलीफ पहुंचाकर व्यक्ति आप (भगवान) के क्रोध को भड़काता है और एक अधार्मिक व्यक्ति बन जाता है।
 
How can such a religion be beneficial which creates hatred between self and others? What good can be achieved by following such a religion? What will be gained from it? By hurting oneself and others through self-hatred, man incurs your (God's) wrath and commits adharma.
तात्पर्य
भगवत-धर्म की प्रक्रिया को छोड़ कर कोई भी धार्मिक व्यवस्था - परमेश्वर का एक शाश्वत सेवक के रूप में सेवा - अपने स्वयं व अन्य के प्रति ही ईर्ष्या की एक व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, ऐसे कई धार्मिक व्यवस्थाएँ हैं जिनमें पशु बलि की सिफारिश की जाती है। ऐसे पशु बलि कर्मकाण्डी और पशु, दोनों के लिए ही अशुभ होते हैं। हालाँकि, कभी-कभी देवी काली के सामने एक पशु की बलि चढ़ाने और उसे वधशाला से मांस क्रय करने की बजाय उसे खाने की अनुमति दी जाती है, देवी काली की उपस्थिति में बलिदान के बाद मांस खाने की अनुमति परम व्यक्तित्व भगवान का आदेश नहीं है। यह केवल उस दयनीय व्यक्ति के लिए एक रियायत है जो मांस खाना नहीं छोड़ेगा। इसका मतलब है कि अबाधित रूप से मांस खाने की उसकी इच्छा को सीमित करना। ऐसी धार्मिक व्यवस्था धिक्कार योग्य है। इसलिए कृष्ण कहते हैं, सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज: "अन्य सभी कर्तव्यों को त्याग दो और मुझे शरण लो।" यही धर्म का अंतिम शब्द है। कोई यह तर्क दे सकता है कि पशुओं की बलि वेदों में अनुशंसित है। हालांकि, यह सिफारिश एक प्रतिबंध है। मांस की खरीद पर वैदिक प्रतिबंधों के बिना, लोग बाजार से मांस खरीदेंगे, जिससे मांस की दुकानों की भरमार हो जाएगी और वधशालाएँ बढ़ जाएँगी। इसे प्रतिबंधित करने के लिए, कभी-कभी वेद कहते हैं कि देवी काली के सामने एक बकरी जैसे एक महत्वहीन जानवर की बलि देने के बाद कोई मांस खा सकता है। किसी भी मामले में, एक धार्मिक व्यवस्था जिसमें पशु बलि की सिफारिश की जाती है, वह बलिदान करने वालों और जानवरों दोनों के लिए अशुभ है। ईर्ष्यालु व्यक्ति जो भड़कीले पशु बलि देते हैं, उन्हें भगवद-गीता (16.17) में निम्नानुसार निंदित किया गया है: आत्म-सम्भावितः स्थब्धा धन-मान-मदान्विताः यजन्ते नाम-यज्ञैस्ते दम्भेनाविधि-पूर्वकम् "आत्म-संतुष्टि और हमेशा निर्लज्ज, धन और झूठी प्रतिष्ठा से बहके हुए, वे कभी-कभी केवल नाम के लिए बिना किसी नियम या विनियम का पालन किए बलिदान करते हैं।" कभी-कभी देवी काली की पूजा के लिए भव्य व्यवस्था के साथ पशु बलि बहुत ही भव्य रूप से की जाती है, लेकिन ऐसे त्यौहार, हालांकि यज्ञ के नाम पर किए जाते हैं, वास्तव में यज्ञ नहीं होते हैं, क्योंकि यज्ञ का अर्थ है भगवान का संतुष्टिकरण। इसलिए यह अनुशंसा की जाती है कि विशेष रूप से इस युग में, यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः: वे जिनके पास अच्छी बुद्धि है, वे हरि कृष्ण मंत्र का जाप करके यज्ञ-पुरुष, विष्णु को संतुष्ट करते हैं। हालाँकि, ईर्ष्यालु व्यक्तियों की सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान द्वारा निम्न प्रकार से निंदा की जाती है: अहंकारं बलं दरपं कामं क्रोधं च संश्रिताः माम आत्म-पर-देहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः तान् अहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् क्षिपाम्य अस्रम् अशुभान् आसुरीष्व एव योनिषु "झूठे अहंकार, शक्ति, घमंड, वासना और क्रोध से भ्रमित, दानव परम व्यक्तित्व भगवान के प्रति ईर्ष्यालु हो जाता है, जो अपने शरीर और दूसरों के शरीर में स्थित है, और वास्तविक धर्म के खिलाफ निंदा करता है। जो लोग ईर्ष्यालु और दुष्ट हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, उन्हें मेरे द्वारा भौतिक अस्तित्व के सागर में, जीवन की विभिन्न आसुरी प्रजातियों में डाल दिया जाता है।" (भगवद गीता 16.18-19) सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान द्वारा इन व्यक्तियों की निंदा की जाती है, जैसा कि शब्द तव कोपः द्वारा इंगित किया गया है। एक व्यक्ति जो हत्या करता है वह अपने आप से और उस व्यक्ति से भी ईर्ष्या करता है जिसकी उसने हत्या की है, क्योंकि हत्या करने का परिणाम यह होता है कि उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा और उसे फाँसी दे दी जाएगी। यदि कोई मानव निर्मित सरकार के कानूनों का उल्लंघन करता है, तो वह राज्य द्वारा मारे जाने से बच सकता है, लेकिन कोई भी ईश्वर के कानूनों से बच नहीं सकता। किसी भी जानवर की हत्या करने वाले को उसके अगले जन्म में उसी जानवर द्वारा मारा जाना होगा। यही प्रकृति का नियम है। सर्वोच्च प्रभु के निर्देशों का पालन करना चाहिए: सर्व-धर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। यदि कोई धर्म की किसी अन्य व्यवस्था का पालन करता है, तो वह सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान द्वारा कई अलग-अलग तरीकों से दंड का पात्र होता है। इसलिए यदि कोई धर्म की एक मनगढ़ंत व्यवस्था का पालन करता है, तो वह न केवल दूसरों से बल्कि अपने आप से भी ईर्ष्या करता है। फलस्वरूप उसकी धार्मिक व्यवस्था बेकार है।

श्रीमद्-भागवतम (1.2.8) का कथन है कि:

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसाम्

विश्वक्सेन-कथासु यः

न उत्पादयेद्यदि रतिम्

श्रम एव हि केवलम्

"पुरुष द्वारा पालन किये गए कर्म (धर्म), व्यवसाय की परवाह किये बिना, व्यर्थ श्रम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते यदि वे सर्वोच्च प्रभु के संदेश के प्रति आकर्षण पैदा नहीं करते।" धर्म की एक प्रणाली का पालन करना जो किसी की कृष्ण चेतना या ईश्वर चेतना को नहीं जगाता, केवल समय और श्रम की बर्बादी है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)