श्रीमद्-भागवतम (1.2.8) का कथन है कि:
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसाम्
विश्वक्सेन-कथासु यः
न उत्पादयेद्यदि रतिम्
श्रम एव हि केवलम्
"पुरुष द्वारा पालन किये गए कर्म (धर्म), व्यवसाय की परवाह किये बिना, व्यर्थ श्रम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होते यदि वे सर्वोच्च प्रभु के संदेश के प्रति आकर्षण पैदा नहीं करते।" धर्म की एक प्रणाली का पालन करना जो किसी की कृष्ण चेतना या ईश्वर चेतना को नहीं जगाता, केवल समय और श्रम की बर्बादी है।
