यदि कोई वास्तव में कृष्ण-भावना में है, तो उसका कोई शत्रु नहीं हो सकता। चूँकि उसकी एकमात्र व्यस्तता दूसरों को कृष्ण या भगवान के प्रति समर्पण करने के लिए प्रेरित करना है, तो उसके शत्रु कैसे हो सकते हैं? यदि कोई हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, यह धर्म या वह धर्म की वकालत करता है, तो संघर्ष होंगे। इतिहास बताता है कि ईश्वर की स्पष्ट अवधारणा के बिना धार्मिक प्रणालियों के अनुयायियों ने एक-दूसरे के साथ संघर्ष किया है। मानव इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं, लेकिन धर्म की वह प्रणालियाँ जो सर्वोच्च के प्रति सेवा पर ध्यान केंद्रित नहीं करती हैं, अस्थायी होती हैं और लंबे समय तक नहीं चल सकती क्योंकि वे ईर्ष्या से भरी होती हैं। ऐसी धार्मिक प्रणालियों के खिलाफ कई गतिविधियां निर्देशित हैं, और इसलिए किसी को "मेरी धारणा" और "आपकी धारणा" का विचार छोड़ देना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को भगवान में विश्वास करना चाहिए और उनके प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए। यही भगवत् धर्म है।
भगवत् धर्म एक बनावटी सांप्रदायिक विश्वास नहीं है, क्योंकि यह शोध को इस बात की तलाश करने की आवश्यकता है कि कैसे सब कुछ कृष्ण से जुड़ा हुआ है (ईशावास्यमिदं सर्वम्)। वैदिक आज्ञाओं के अनुसार, सर्वं खल्विदं ब्रह्म: ब्रह्म, सर्वोच्च, हर चीज में मौजूद है। भगवत् धर्म सर्वोच्च की इस उपस्थिति को पकड़ लेता है। भगवत् धर्म दुनिया की हर चीज को झूठा नहीं मानता। क्योंकि हर चीज़ सर्वोच्च से निकलती है, कुछ भी झूठा नहीं हो सकता। सर्वोच्च की सेवा में हर चीज़ का कुछ उपयोग है। उदाहरण के लिए, हम अभी एक माइक्रोफोन पर निर्देश दे रहे हैं और एक डिक्टेटिंग मशीन पर रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, और इस तरह हम यह पता लगा रहे हैं कि मशीन को सर्वोच्च ब्रह्म से कैसे जोड़ा जा सकता है। चूँकि हम इस मशीन का उपयोग भगवान की सेवा में कर रहे हैं, इसलिए यह ब्रह्म है। यही सर्वं खल्विदं ब्रह्म का अर्थ है। सब कुछ ब्रह्म है क्योंकि सर्वोच्च प्रभु की सेवा के लिए हर चीज का उपयोग किया जा सकता है। कुछ भी मिथ्या, झूठा नहीं है; सब कुछ तथ्यात्मक है।
भगवत् धर्म को सर्वोत्कृष्ट कहा जाता है, जो सभी धार्मिक प्रणालियों में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जो लोग भगवत् धर्म का पालन करते हैं, वे किसी से ईर्ष्या नहीं करते हैं। शुद्ध भगवत, शुद्ध भक्त, सभी को, बिना ईर्ष्या के, कृष्ण चेतना आंदोलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। इसलिए एक भक्त बिल्कुल सर्वोच्च ईश्वर व्यक्तित्व की तरह होता है। सुहृदं सर्व-भूतनाम: वह सभी जीवों का मित्र है। इसलिए यह सभी धार्मिक प्रणालियों में सर्वश्रेष्ठ है। जबकि तथाकथित धर्म एक विशेष प्रकार के व्यक्ति के लिए होते हैं जो किसी विशेष तरीके से विश्वास करता है, कृष्ण चेतना, या भगवत् धर्म में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। अगर हम देवताओं या सर्वोच्च पुरुष ईश्वर व्यक्तित्व के अलावा किसी और की पूजा के लिए अभिप्रेत धार्मिक प्रणालियों की जाँच करें, तो हम पाएंगे कि वे ईर्ष्या से भरे हुए हैं और इसलिए वे अपवित्र हैं।
