श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  6.16.41 
विषममतिर्न यत्र नृणां
त्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र ।
विषमधिया रचितो य:
स ह्यविशुद्ध: क्षयिष्णुरधर्मबहुल: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
भागवत-धर्म को छोड़कर शेष सभी धर्म विरोधाभासों से भरे हैं और कर्मफल की कामना से ओत-प्रोत हैं। वे "तुम और मैं" और "तुम्हारा और मेरा" जैसे भेदभावों से भरे हुए हैं। श्रीमद्-भागवत के अनुयायियों में ऐसी चेतना नहीं होती है। वे कृष्ण भावनामृता से परिपूर्ण रहते हैं और अपने को कृष्ण का और कृष्ण को अपना मानते हैं। कुछ निम्न-कोटि की धार्मिक प्रथाएँ भी हैं, जो शत्रुओं को मारने या रहस्यमय शक्ति प्राप्त करने के लिए बनाई गई हैं, लेकिन ये काम और द्वेष से भरी होने के कारण अपवित्र और नष्ट होने वाली हैं। द्वेषपूर्ण होने के कारण वे अधर्म से भरे हुए हैं।
 
All religions, except the Bhagavata religion, are full of conventional contradictions and are full of the selfish ideology of karma and the discriminations like 'you and me' and 'yours and mine'. The followers of the Srimad Bhagavatam do not have such a consciousness. They are filled with Krishna consciousness and consider themselves to be of Sri Krishna and Sri Krishna as their own. There are also some low-grade religious systems, which are designed to kill the enemies or to acquire yogic power, but these are impure and perishable because they are full of lust and hatred. Being full of hatred, they are full of irreligion.
तात्पर्य
भगवत्धर्म में कोई विरोधाभास नहीं है। "आपका धर्म" और "मेरा धर्म" जैसी अवधारणाएँ भगवत् धर्म से पूरी तरह अनुपस्थित हैं। भगवत् धर्म का अर्थ सर्वोच्च भगवान, भगवान द्वारा दिए गए आदेशों का पालन करना है, जैसा कि भगवद-गीता में कहा गया है: सर्व-धर्मम परित्यज्य माम एकम शरणं व्रज। ईश्वर एक है, और ईश्वर सभी के लिए है। इसलिए हर किसी को भगवान के सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए। यही धर्म की शुद्ध अवधारणा है। ईश्वर जो भी आदेश देते हैं, वह धर्म का निर्माण करता है (धर्मं च साक्षाद्भगवतप्रणीतम्)। भगवत् धर्म में "आप क्या मानते हैं" और "मैं क्या मानता हूँ" इसका कोई सवाल ही नहीं है। सभी को सर्वोच्च भगवान पर विश्वास करना चाहिए और उनके आदेशों का पालन करना चाहिए। अनुकूल्येन कृष्णानुशीलनम: जो कुछ भी कृष्ण कहते हैं - जो कुछ भी भगवान कहते हैं - उसे सीधे तौर पर पूरा किया जाना चाहिए। यही धर्म है।

यदि कोई वास्तव में कृष्ण-भावना में है, तो उसका कोई शत्रु नहीं हो सकता। चूँकि उसकी एकमात्र व्यस्तता दूसरों को कृष्ण या भगवान के प्रति समर्पण करने के लिए प्रेरित करना है, तो उसके शत्रु कैसे हो सकते हैं? यदि कोई हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, ईसाई धर्म, यह धर्म या वह धर्म की वकालत करता है, तो संघर्ष होंगे। इतिहास बताता है कि ईश्वर की स्पष्ट अवधारणा के बिना धार्मिक प्रणालियों के अनुयायियों ने एक-दूसरे के साथ संघर्ष किया है। मानव इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं, लेकिन धर्म की वह प्रणालियाँ जो सर्वोच्च के प्रति सेवा पर ध्यान केंद्रित नहीं करती हैं, अस्थायी होती हैं और लंबे समय तक नहीं चल सकती क्योंकि वे ईर्ष्या से भरी होती हैं। ऐसी धार्मिक प्रणालियों के खिलाफ कई गतिविधियां निर्देशित हैं, और इसलिए किसी को "मेरी धारणा" और "आपकी धारणा" का विचार छोड़ देना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को भगवान में विश्वास करना चाहिए और उनके प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए। यही भगवत् धर्म है।

भगवत् धर्म एक बनावटी सांप्रदायिक विश्वास नहीं है, क्योंकि यह शोध को इस बात की तलाश करने की आवश्यकता है कि कैसे सब कुछ कृष्ण से जुड़ा हुआ है (ईशावास्यमिदं सर्वम्)। वैदिक आज्ञाओं के अनुसार, सर्वं खल्विदं ब्रह्म: ब्रह्म, सर्वोच्च, हर चीज में मौजूद है। भगवत् धर्म सर्वोच्च की इस उपस्थिति को पकड़ लेता है। भगवत् धर्म दुनिया की हर चीज को झूठा नहीं मानता। क्योंकि हर चीज़ सर्वोच्च से निकलती है, कुछ भी झूठा नहीं हो सकता। सर्वोच्च की सेवा में हर चीज़ का कुछ उपयोग है। उदाहरण के लिए, हम अभी एक माइक्रोफोन पर निर्देश दे रहे हैं और एक डिक्टेटिंग मशीन पर रिकॉर्डिंग कर रहे हैं, और इस तरह हम यह पता लगा रहे हैं कि मशीन को सर्वोच्च ब्रह्म से कैसे जोड़ा जा सकता है। चूँकि हम इस मशीन का उपयोग भगवान की सेवा में कर रहे हैं, इसलिए यह ब्रह्म है। यही सर्वं खल्विदं ब्रह्म का अर्थ है। सब कुछ ब्रह्म है क्योंकि सर्वोच्च प्रभु की सेवा के लिए हर चीज का उपयोग किया जा सकता है। कुछ भी मिथ्या, झूठा नहीं है; सब कुछ तथ्यात्मक है।

भगवत् धर्म को सर्वोत्कृष्ट कहा जाता है, जो सभी धार्मिक प्रणालियों में सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि जो लोग भगवत् धर्म का पालन करते हैं, वे किसी से ईर्ष्या नहीं करते हैं। शुद्ध भगवत, शुद्ध भक्त, सभी को, बिना ईर्ष्या के, कृष्ण चेतना आंदोलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित करते हैं। इसलिए एक भक्त बिल्कुल सर्वोच्च ईश्वर व्यक्तित्व की तरह होता है। सुहृदं सर्व-भूतनाम: वह सभी जीवों का मित्र है। इसलिए यह सभी धार्मिक प्रणालियों में सर्वश्रेष्ठ है। जबकि तथाकथित धर्म एक विशेष प्रकार के व्यक्ति के लिए होते हैं जो किसी विशेष तरीके से विश्वास करता है, कृष्ण चेतना, या भगवत् धर्म में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। अगर हम देवताओं या सर्वोच्च पुरुष ईश्वर व्यक्तित्व के अलावा किसी और की पूजा के लिए अभिप्रेत धार्मिक प्रणालियों की जाँच करें, तो हम पाएंगे कि वे ईर्ष्या से भरे हुए हैं और इसलिए वे अपवित्र हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)