श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.16.4 
जीव उवाच
कस्मिञ्जन्मन्यमी मह्यं पितरो मातरोऽभवन् ।
कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यङ्‌नृयोनिषु ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि की योगशक्ति से जीवन जीवात्मा थोड़े समय के लिए मृत शरीर में पुनः प्रवेश कर गया और नारद मुनि के निवेदन पर उसने कहा: "मैं, जीव, अपने कर्मो के फलस्वरूप एक शरीर से दूसरे शरीर में भ्रमण करता रहता हूँ; कभी देवताओं की तरह, कभी नीच प्राणियों की तरह, कभी पौधों की तरह और कभी मनुष्यों की तरह। तो फिर ये किस जन्म में मेरे माता-पिता थे? वास्तव में, न कोई मेरी माँ है और न ही कोई पिता। तो मैं इन दोनों लोगों को कैसे अपना माता-पिता स्वीकार कर सकता हूँ?
 
By the yogic powers of Narad Muni, the soul re-entered the dead body for a short time and spoke at the request of Narad Muni, “I (the soul) keep transmigrating from one body to another according to the results of my actions; thus sometimes I live in the form of gods, sometimes in the form of lower animals or plants and sometimes in the form of human beings. So in which birth were these my mother and father? In reality, neither is anyone my mother nor my father. So how can I accept these two persons as my parents?
तात्पर्य
यहाँ यह स्पष्टरूप से बता दिया गया है कि जीव में एक भौतिक शरीर का प्रवेश होता है जो पाँच स्थूल भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) और तीन सूक्ष्म तत्वों (मन, बुद्धि और अहंकार) से बनी एक मशीन के समान होता है। जैसा श्रीमद्भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है, दो अलग-अलग पहचान हैं, जिन्हें निम्न और श्रेष्ठ प्रकृति कहा जाता है, जो दोनों ही भगवान के हैं। जीव के कामोपभोग कर्मों के परिणामों के अनुसार, उसे भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों में भौतिक तत्वों में प्रवेश करने के लिए विवश किया जाता है। इस बार जीव को महाराज चित्रकेतु और रानी कृतद्युति का पुत्र माना गया था, क्योंकि प्रकृति के नियमों के अनुसार उसने राजा और रानी द्वारा निर्मित शरीर में प्रवेश किया था। वास्तव में, वह उनका पुत्र नहीं था। जीव भगवान का पुत्र है, और क्योंकि वह इस भौतिक संसार का आनंद उठाना चाहता है, भगवान उसे विभिन्न शरीरों में प्रवेश करने का मौका देते हैं। जीव का उस भौतिक पिता और माँ से मिले भौतिक शरीर से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। वह भगवान का अंश है, लेकिन उसे विभिन्न शरीरों से गुज़रने दिया जाता है। तथाकथित पिता और माँ द्वारा निर्मित शरीर का उनके तथाकथित रचनाकारों से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए जीव ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया कि महाराज चित्रकेतु और उनकी पत्नी उसके माता-पिता थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)