जन्म कर्म च मे दिव्यम्
एवं यो वेत्ति तत्त्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म
नैति माम् एति सोऽर्जुन
"जो मेरे अवतरण और कर्मों की दिव्य प्रकृति को तत्वतः जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद इस भौतिक संसार में फिर से जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त हो जाता है, हे अर्जुन।" यदि कोई केवल कृष्ण को समझने के लिए कृष्ण चेतना में व्यस्त रहता है, तो वह निश्चित रूप से बार-बार जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त हो जाता है। जैसा कि भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है, त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति: ऐसा व्यक्ति, केवल कृष्ण चेतना में व्यस्त होकर या भगवान् कृष्ण के परम व्यक्तित्व को समझकर, भगवान् के पास घर लौटने के लिए बिल्कुल योग्य हो जाता है। यहाँ तक कि जो लोग भौतिक इच्छाओं से ग्रस्त हैं, वे भी भगवान् के परम व्यक्तित्व की इतनी दृढ़ता से पूजा कर सकते हैं कि वे भगवान् के पास वापस चले जाते हैं। तथ्य यह है कि यदि कोई कृष्ण चेतना में आता है, तो भले ही उसकी कई भौतिक इच्छाएँ हो सकती हैं, लेकिन वह भगवान् के पवित्र नाम का जप करके परम भगवान् से जुड़कर कृष्ण के चरण कमलों के प्रति अधिकाधिक आकर्षित होता जाता है। परम भगवान् और उनका पवित्र नाम एक समान हैं। इस प्रकार वह भौतिक आनंद के प्रति लगाव में अरुचि रखने लगता है। जीवन की पूर्णता भौतिक आनंद में अरुचि रखने और कृष्ण में रुचि रखने में है। यदि कोई किसी भी तरह से कृष्ण चेतना में आता है, यहाँ तक कि भौतिक लाभ के लिए भी, तो परिणाम यह होगा कि वह मुक्त हो जाएगा। कामद् द्वेषाद् भयात् स्नेहात्। भौतिक इच्छाओं की संतुष्टि के लिए, ईर्ष्या के प्रभाव के कारण, भय के कारण, स्नेह के कारण या किसी अन्य कारण से भी, यदि कोई कृष्ण के पास आता है, तो उसका जीवन सफल होता है।
