श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  6.16.39 
कामधियस्त्वयि रचिता
न परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि ।
ज्ञानात्मन्यगुणमये
गुणगणतोऽस्य द्वन्द्वजालानि ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
हे परम परमेश्वर! यदि ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले व्यक्ति भी ज्ञान के स्रोत और भौतिक गुणों से रहित आपकी आराधना करते हैं, तो उनका पुनर्जन्म नहीं होता है, जैसे कि भुने हुए बीजों से पौधे नहीं उगते हैं। जीवों को जन्म और मृत्यु के चक्र से गुजरना पड़ता है क्योंकि वे भौतिक प्रकृति से बंधे होते हैं, लेकिन चूँकि आप दिव्य हैं, इसलिए जो आपसे जुड़ता है, वह भौतिक प्रकृति के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
 
O Supreme Lord, if even those who desire sense gratification through opulence worship You, the source of all knowledge and beyond the material modes, they will not be reborn, just as plants will not grow from roasted seeds. Living entities have to go through the cycle of birth and death because they are conditioned by material nature, but You are transcendental, and therefore, one who associates with You is released from the bondage of material nature.
तात्पर्य
हिंदी-रूपांतरण: श्रीमद्भगवद्गीता (4.9) में इसकी पुष्टि होती है, जिसमें भगवान् कहते हैं:

जन्म कर्म च मे दिव्यम्‌

एवं यो वेत्ति तत्त्वतः‌

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म

नैति माम् एति सोऽर्जुन

"जो मेरे अवतरण और कर्मों की दिव्य प्रकृति को तत्वतः जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद इस भौतिक संसार में फिर से जन्म नहीं लेता है, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त हो जाता है, हे अर्जुन।" यदि कोई केवल कृष्ण को समझने के लिए कृष्ण चेतना में व्यस्त रहता है, तो वह निश्चित रूप से बार-बार जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया से मुक्त हो जाता है। जैसा कि भगवद्गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है, त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति: ऐसा व्यक्ति, केवल कृष्ण चेतना में व्यस्त होकर या भगवान् कृष्ण के परम व्यक्तित्व को समझकर, भगवान् के पास घर लौटने के लिए बिल्कुल योग्य हो जाता है। यहाँ तक कि जो लोग भौतिक इच्छाओं से ग्रस्त हैं, वे भी भगवान् के परम व्यक्तित्व की इतनी दृढ़ता से पूजा कर सकते हैं कि वे भगवान् के पास वापस चले जाते हैं। तथ्य यह है कि यदि कोई कृष्ण चेतना में आता है, तो भले ही उसकी कई भौतिक इच्छाएँ हो सकती हैं, लेकिन वह भगवान् के पवित्र नाम का जप करके परम भगवान् से जुड़कर कृष्ण के चरण कमलों के प्रति अधिकाधिक आकर्षित होता जाता है। परम भगवान् और उनका पवित्र नाम एक समान हैं। इस प्रकार वह भौतिक आनंद के प्रति लगाव में अरुचि रखने लगता है। जीवन की पूर्णता भौतिक आनंद में अरुचि रखने और कृष्ण में रुचि रखने में है। यदि कोई किसी भी तरह से कृष्ण चेतना में आता है, यहाँ तक कि भौतिक लाभ के लिए भी, तो परिणाम यह होगा कि वह मुक्त हो जाएगा। कामद् द्वेषाद् भयात् स्नेहात्। भौतिक इच्छाओं की संतुष्टि के लिए, ईर्ष्या के प्रभाव के कारण, भय के कारण, स्नेह के कारण या किसी अन्य कारण से भी, यदि कोई कृष्ण के पास आता है, तो उसका जीवन सफल होता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)