श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  6.16.37 
क्षित्यादिभिरेष किलावृत:
सप्तभिर्दशगुणोत्तरैरण्डकोश: ।
यत्र पतत्यणुकल्प:
सहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्त: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
हर ब्रह्मांड सात आवरणों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सकल भौतिक शक्ति और अहंकार—से घिरा है। प्रत्येक आवरण अपने से पहले वाले से दस गुना विशाल है। इस ब्रह्मांड के अलावा भी अनगिनत ब्रह्मांड हैं, जो असीम और विशाल हैं और आप में मौजूद परमाणुओं की तरह चक्कर लगाते हैं। इसीलिए आपको अनंत कहा जाता है।
 
Each universe is surrounded by seven coverings—earth, water, fire, air, space, all material energy and ego—each of which is ten times larger than the previous one. Besides this universe, there are innumerable universes, which are infinite and vast and revolve like atoms within You. Therefore, You are called infinite.
तात्पर्य
ब्रह्मा-संहिता (5.48) कहती है:

यस्याइक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्य

जीवन्ति लोम-विलाजा जगद्-अण्ड-नाथाः

विष्णुर् महान् स इह यस्य कला-विशेषो

गोविन्दम् आदि-पुरुषं तमहं भजामि

भौतिक सृष्टि का उद्भव महा-विष्णु से हुआ है, जो कारण महासागर में स्थित हैं। जब वे उस सागर में सोते हैं, तो उनके श्वास लेने पर लाखों ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं, और उनके श्वास छोड़ने पर वे सभी नष्ट हो जाते हैं। यह महा-विष्णु विष्णु, गोविंद (यस्य कला-विशेष:) के एक पूर्ण अंश का पूर्ण अंश है। शब्द कला पूर्ण अंश के पूर्ण अंश को संदर्भित करता है। कृष्ण, या गोविंद, से बलराम आते हैं; बलराम से सांकर्षण आते हैं; सांकर्षण से नारायण आते हैं; नारायण से, दूसरा सांकर्षण आता है; दूसरे सांकर्षण से, महा-विष्णु आते हैं; महा-विष्णु से, गर्भोदकशायी विष्णु आते हैं; और गर्भोदकशायी विष्णु से, क्षीरोंदकशायी विष्णु आते हैं। क्षीरोंदकशायी विष्णु प्रत्येक ब्रह्मांड को नियंत्रित करते हैं। यह अनंत, असीमित के अर्थ का विचार देता है। प्रभु की असीमित शक्ति और अस्तित्व के बारे में क्या कहा जाए? यह श्लोक ब्रह्मांड के आवरणों (सप्तभिर् दश-गुणोत्तराइर अंड-कोश:) का वर्णन करता है। पहला आवरण पृथ्वी है, दूसरा पानी है, तीसरा अग्नि है, चौथा वायु है, पाँचवाँ आकाश है, छठा कुल भौतिक ऊर्जा है, और सातवाँ अहंकार है। पृथ्वी के आवरण से शुरू होकर, प्रत्येक आवरण पिछले आवरण से दस गुना बड़ा होता है। इस प्रकार हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि प्रत्येक ब्रह्मांड कितना महान है, और वहाँ लाखों ब्रह्मांड हैं। जैसा कि स्वयं भगवान ने भगवद गीता (10.42) में पुष्टि की है:

अथावा बहुनैतेन

किं ज्ञातेन तवार्जुन

विष्टभ्याहम इदं कृत्स्नम्

एकांशेन स्थितो जगत्

"लेकिन अर्जुन, इस सभी विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं अपने एक अंश से ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड को व्याप्त करता हूँ और उसे धारण करता हूँ।" संपूर्ण भौतिक संसार सर्वोच्च भगवान की ऊर्जा के केवल एक चौथाई भाग को प्रकट करता है। इसलिए उन्हें अनंत कहा जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)