श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  6.16.35 
तव विभव: खलु भगवन्
जगदुदयस्थितिलयादीनि ।
विश्वसृजस्तेꣷशांशा
स्तत्र मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे ईश्वर! ये सारा संसार और इसकी उत्पत्ति, पालन एवं संहार ये सभी आपकी शान और सामर्थ्य हैं। क्योंकि ब्रह्मा और बाकी देवता आपके अंश के भी अंश मात्र हैं, तो सृष्टि रचने की उनकी आंशिक शक्ति उन्हें भगवान नहीं बना सकती। इसलिए खुद को ईश्वर मानने की उनकी सोच उनके अहंकार की निशानी है। यह उचित या वैध नहीं है।
 
O Lord! This visible world and its creation, sustenance and destruction—all these are Your opulences. Since Brahma and other creators are minor parts of Your part, their partial power to create cannot make them God. Still, the consciousness of considering themselves as separate God is a sign of their ego only. This is not valid.
तात्पर्य
जो भक्त भगवान के चरण कमलों पर पूरी तरह समर्पित है, वह बहुत अच्छी तरह जानता है कि जीवित प्राणियों की रचनात्मक ऊर्जा, भगवान ब्रह्मा से लेकर छोटी चींटी तक, इसलिए मौजूद है क्योंकि जीवित प्राणी भगवान के अभिन्न अंग हैं। भगवद्-गीता (15.7) में भगवान कहते हैं, ममैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः: "इस संसार में जीवित प्राणी मेरे शाश्वत, टुकड़े टुकड़े हैं।" जीवित प्राणी परम आत्मा के अति छोटे हिस्सों के अलावा और कुछ नहीं हैं, जैसे आग की चिंगारी। चूँकि वे परम के अंग हैं, इसलिए उनमें एक बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में रचनात्मक गुण है।

आधुनिक भौतिकवादी दुनिया के तथाकथित वैज्ञानिक गर्व करते हैं क्योंकि उन्होंने आधुनिक सुविधाएं बनाई हैं जैसे कि महान हवाई जहाज, लेकिन हवाई जहाज बनाने का श्रेय भगवान को जाना चाहिए, न कि उन वैज्ञानिकों को जिन्होंने तथाकथित अद्भुत उत्पादों का आविष्कार या निर्माण किया है। पहला विचार वैज्ञानिक की बुद्धि है; भगवान के निर्देशन से एक को ऊंचा उठाया जाना चाहिए, जो भगवद्-गीता (15.15) में कहते हैं, मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहनं च: "मेरे से स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है।" क्योंकि भगवान, अध्यात्म आत्मा के रूप में, हर जीवित प्राणी के हृदय के मूल के भीतर बैठता है, वह निर्देश जिसके द्वारा कोई वैज्ञानिक ज्ञान या रचनात्मक क्षमताओं में आगे बढ़ता है, वह उसी से आता है। इसके अलावा, हवाई जहाज जैसी अद्भुत मशीनों के निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं, बल्कि भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। हवाई जहाज के बनने से पहले, उसकी सामग्री पहले से ही मौजूद थी, भगवान के कारण, लेकिन जब हवाई जहाज की प्रकट रचना बर्बाद हो जाती है, तो बचा हुआ मलबा तथाकथित रचनाकारों के लिए एक समस्या बन जाता है। एक और उदाहरण यह है कि पश्चिम कई ऑटोमोबाइल बना रहा है। इन कारों के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री, निश्चित रूप से, भगवान द्वारा प्रदान की जाती है, और तथाकथित निर्माण के लिए बुद्धि भी भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। अंततः, जब कारों को ध्वस्त कर दिया जाता है, तो तथाकथित रचनाकारों को उनकी सामग्री का क्या करना है, इस समस्या का सामना करना पड़ता है। वास्तविक निर्माता, मूल निर्माता, भगवान का व्यक्तित्व है। केवल अंतरिम में ही कोई प्रभु द्वारा प्रदान की गई बुद्धि से कुछ बनाता है, और बाद में सृष्टि फिर से समस्या बन जाती है। इसलिए तथाकथित निर्माता को सृजन के कार्य का श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए; एकमात्र श्रेय भगवान के व्यक्तित्व को जाता है। यहाँ ठीक ही कहा गया है कि सृजन, पालन और संहार के सभी वैभव का श्रेय जीवित प्राणियों को नहीं, बल्कि परमेश्वर को है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)