आधुनिक भौतिकवादी दुनिया के तथाकथित वैज्ञानिक गर्व करते हैं क्योंकि उन्होंने आधुनिक सुविधाएं बनाई हैं जैसे कि महान हवाई जहाज, लेकिन हवाई जहाज बनाने का श्रेय भगवान को जाना चाहिए, न कि उन वैज्ञानिकों को जिन्होंने तथाकथित अद्भुत उत्पादों का आविष्कार या निर्माण किया है। पहला विचार वैज्ञानिक की बुद्धि है; भगवान के निर्देशन से एक को ऊंचा उठाया जाना चाहिए, जो भगवद्-गीता (15.15) में कहते हैं, मत्तः स्मृतिर् ज्ञानमपोहनं च: "मेरे से स्मरण, ज्ञान और विस्मृति आती है।" क्योंकि भगवान, अध्यात्म आत्मा के रूप में, हर जीवित प्राणी के हृदय के मूल के भीतर बैठता है, वह निर्देश जिसके द्वारा कोई वैज्ञानिक ज्ञान या रचनात्मक क्षमताओं में आगे बढ़ता है, वह उसी से आता है। इसके अलावा, हवाई जहाज जैसी अद्भुत मशीनों के निर्माण के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री भी वैज्ञानिकों द्वारा नहीं, बल्कि भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। हवाई जहाज के बनने से पहले, उसकी सामग्री पहले से ही मौजूद थी, भगवान के कारण, लेकिन जब हवाई जहाज की प्रकट रचना बर्बाद हो जाती है, तो बचा हुआ मलबा तथाकथित रचनाकारों के लिए एक समस्या बन जाता है। एक और उदाहरण यह है कि पश्चिम कई ऑटोमोबाइल बना रहा है। इन कारों के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री, निश्चित रूप से, भगवान द्वारा प्रदान की जाती है, और तथाकथित निर्माण के लिए बुद्धि भी भगवान द्वारा प्रदान की जाती है। अंततः, जब कारों को ध्वस्त कर दिया जाता है, तो तथाकथित रचनाकारों को उनकी सामग्री का क्या करना है, इस समस्या का सामना करना पड़ता है। वास्तविक निर्माता, मूल निर्माता, भगवान का व्यक्तित्व है। केवल अंतरिम में ही कोई प्रभु द्वारा प्रदान की गई बुद्धि से कुछ बनाता है, और बाद में सृष्टि फिर से समस्या बन जाती है। इसलिए तथाकथित निर्माता को सृजन के कार्य का श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए; एकमात्र श्रेय भगवान के व्यक्तित्व को जाता है। यहाँ ठीक ही कहा गया है कि सृजन, पालन और संहार के सभी वैभव का श्रेय जीवित प्राणियों को नहीं, बल्कि परमेश्वर को है।
