शुद्ध भक्तों को सम-मति के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है कि वो कभी भी किसी भी परिस्थिति में भक्ति सेवा से विचलित नहीं होते। ऐसा नहीं है कि भक्त केवल खुश होने पर ही सर्वोच्च ईश्वर की पूजा करते हैं; वो विपत्ति के समय में भी उनकी पूजा करते हैं। सुख और दुःख, भक्ति सेवा की प्रक्रिया में बाधा नहीं डालते। इसलिए श्रीमद्-भागवतम् कहता है कि भक्ति सेवा अहैतुकी अप्रतिहता है, बिना किसी उद्देश्य के और निर्बाधित होती है। जब कोई भक्त बिना किसी उद्देश्य (अन्याभिलाषित-शून्यम) के ईश्वर को भक्ति सेवा प्रदान करता है, तो उसकी सेवा किसी भी भौतिक स्थिति (अप्रतिहता) से बाधित नहीं हो सकती। इस तरह एक भक्त जो जीवन की सभी स्थितियों में सेवा प्रदान करता है, वो ईश्वर को जीत सकता है।
भक्तों और अन्य दिव्यवादियों, अर्थात् ज्ञानियों और योगियों के बीच एक विशेष अंतर यह है कि ज्ञानी और योगी कृत्रिम रूप से सर्वोच्च के साथ एक होने का प्रयास करते हैं, जबकि भक्त ऐसी असंभव उपलब्धि की कभी आकांक्षा नहीं करते। भक्त जानते हैं कि उनका पद, सर्वोच्च ईश्वर का शाश्वत सेवक होना है और कभी भी उनके साथ एक नहीं होना है। इसलिए उन्हें सम-मति या जित्मात्मा कहा जाता है। वो सर्वोच्च के साथ एकता से घृणा करते हैं। उनकी एकता के लिए कोई वासनापूर्ण इच्छा नहीं है; इसके बजाय, उनकी इच्छा सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने की है। इसलिए उन्हें निष्काम, इच्छाहीन कहा जाता है। एक जीवित इकाई इच्छाओं के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती, लेकिन वो इच्छाएं जो कभी पूरी नहीं हो सकतीं, काम कहलाती हैं, वासनापूर्ण इच्छाएं। कामैस्तैस्तैरहृतज्ञानाः: वासनापूर्ण इच्छाओं के कारण, अधर्मी लोग अपनी बुद्धि से वंचित हो जाते हैं। इस प्रकार वो ईश्वर को जीतने में असमर्थ होते हैं, जबकि भक्त, ऐसी अनुचित इच्छाओं से मुक्त होकर, प्रभु को जीत सकते हैं। ऐसे भक्त ईश्वर द्वारा भी विजित होते हैं। चूँकि वो शुद्ध होते हैं, सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने के कारण, वो ईश्वर के सामने पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देते हैं, और इसलिए भगवान उन्हें जीत लेते हैं। ऐसे भक्त कभी भी मोक्ष की आकांक्षा नहीं करते। वो केवल भगवान के चरण कमलों की सेवा करने की इच्छा करते हैं। चूँकि वो भगवान की सेवा बिना पारिश्रमिक की इच्छा के करते हैं, इसलिए वो भगवान की दया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। भगवान स्वभाव से बहुत दयालु हैं, और जब वो देखते हैं कि उनका सेवक भौतिक लाभ की इच्छा के बिना काम कर रहा है, तो स्वाभाविक रूप से वो विजित हो जाते हैं।
भक्त हमेशा सेवा में लगे रहते हैं।
स वई मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर
वाचांसि वैकुण्ठ-गुणाనుवर्णने
उनकी सभी इंद्रियों की गतिविधियाँ भगवान की सेवा में व्यस्त हैं। ऐसी भक्ति के कारण, भगवान स्वयं को अपने भक्तों को इस तरह देते हैं जैसे वो उन्हें किसी भी उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकते हैं जिसकी उनकी इच्छा हो सकती है। निश्चित रूप से, भक्तों का सेवा के अलावा कोई उद्देश्य नहीं होता। जब एक भक्त पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देता है और भौतिक लाभ की कोई आकांक्षा नहीं रखता, तो भगवान निश्चित रूप से उसे सेवा के सभी अवसर देते हैं। यह भगवान की स्थिति है जब उनके भक्त उन्हें जीत लेते हैं।
