श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.16.34 
चित्रकेतुरुवाच
अजित जित: सममतिभि:
साधुभिर्भवान् जितात्मभिर्भवता ।
विजितास्तेऽपि च भजता-
मकामात्मनां य आत्मदोऽतिकरुण: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
चित्रकेतु ने कहा- हे अजेय भगवान, चाहे कोइ तुमसे जीत न पाए, परंतु तुम्हें भक्त जीत ही लेते हैं जिनका अपने मन-इन्द्रियों पर पूरा अधिकार है। वे इसलिए तुम्हें वश में रख पाते हैं क्योंकि तुम निष्काम भक्तों पर बिना कारण ही दयालु होते रहते हो। तुम निस्संदेह उन्हें अपने को दे देते हो और इसलिए तुम्हारा पूर्ण नियंत्रण अपने भक्तों पर रहता है।
 
Citraketu said—O invincible Lord! Though no one can conquer You, You are certainly conquered by those devotees who have control over their mind and senses. They are able to control You because You are without reason kind to those devotees who do not seek any kind of benefit from You. Indeed, You give Yourself to them; therefore You also have complete control over Your devotees.
तात्पर्य
संसार और भक्त दोनों विजयी होते हैं। भगवान, भक्तों द्वारा विजित होते हैं और भक्त, भगवान द्वारा विजित होते हैं। एक-दूसरे द्वारा विजित होने के कारण, वो दोनों, अपने संबंधों से दिव्य आनंद प्राप्त करते हैं। इस पारस्परिक विजय की सर्वोच्च पूर्णता, कृष्ण और गोपियों द्वारा प्रदर्शित की गई है। गोपियों ने कृष्ण को विजित किया, और कृष्ण ने गोपियों को विजित किया। इस प्रकार जब भी कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते थे, वो गोपियों के मन को जीत लेते थे और गोपियों को देखे बिना कृष्ण खुश नहीं हो सकते थे। अन्य दिव्यवादी, जैसे ज्ञानी और योगी, ईश्वर को विजित नहीं कर सकते; केवल शुद्ध भक्त ही उन्हें जीत सकते हैं।

शुद्ध भक्तों को सम-मति के रूप में वर्णित किया गया है, जिसका अर्थ है कि वो कभी भी किसी भी परिस्थिति में भक्ति सेवा से विचलित नहीं होते। ऐसा नहीं है कि भक्त केवल खुश होने पर ही सर्वोच्च ईश्वर की पूजा करते हैं; वो विपत्ति के समय में भी उनकी पूजा करते हैं। सुख और दुःख, भक्ति सेवा की प्रक्रिया में बाधा नहीं डालते। इसलिए श्रीमद्-भागवतम् कहता है कि भक्ति सेवा अहैतुकी अप्रतिहता है, बिना किसी उद्देश्य के और निर्बाधित होती है। जब कोई भक्त बिना किसी उद्देश्य (अन्याभिलाषित-शून्यम) के ईश्वर को भक्ति सेवा प्रदान करता है, तो उसकी सेवा किसी भी भौतिक स्थिति (अप्रतिहता) से बाधित नहीं हो सकती। इस तरह एक भक्त जो जीवन की सभी स्थितियों में सेवा प्रदान करता है, वो ईश्वर को जीत सकता है।

भक्तों और अन्य दिव्यवादियों, अर्थात् ज्ञानियों और योगियों के बीच एक विशेष अंतर यह है कि ज्ञानी और योगी कृत्रिम रूप से सर्वोच्च के साथ एक होने का प्रयास करते हैं, जबकि भक्त ऐसी असंभव उपलब्धि की कभी आकांक्षा नहीं करते। भक्त जानते हैं कि उनका पद, सर्वोच्च ईश्वर का शाश्वत सेवक होना है और कभी भी उनके साथ एक नहीं होना है। इसलिए उन्हें सम-मति या जित्मात्मा कहा जाता है। वो सर्वोच्च के साथ एकता से घृणा करते हैं। उनकी एकता के लिए कोई वासनापूर्ण इच्छा नहीं है; इसके बजाय, उनकी इच्छा सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने की है। इसलिए उन्हें निष्काम, इच्छाहीन कहा जाता है। एक जीवित इकाई इच्छाओं के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकती, लेकिन वो इच्छाएं जो कभी पूरी नहीं हो सकतीं, काम कहलाती हैं, वासनापूर्ण इच्छाएं। कामैस्तैस्तैरहृतज्ञानाः: वासनापूर्ण इच्छाओं के कारण, अधर्मी लोग अपनी बुद्धि से वंचित हो जाते हैं। इस प्रकार वो ईश्वर को जीतने में असमर्थ होते हैं, जबकि भक्त, ऐसी अनुचित इच्छाओं से मुक्त होकर, प्रभु को जीत सकते हैं। ऐसे भक्त ईश्वर द्वारा भी विजित होते हैं। चूँकि वो शुद्ध होते हैं, सभी भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने के कारण, वो ईश्वर के सामने पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देते हैं, और इसलिए भगवान उन्हें जीत लेते हैं। ऐसे भक्त कभी भी मोक्ष की आकांक्षा नहीं करते। वो केवल भगवान के चरण कमलों की सेवा करने की इच्छा करते हैं। चूँकि वो भगवान की सेवा बिना पारिश्रमिक की इच्छा के करते हैं, इसलिए वो भगवान की दया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। भगवान स्वभाव से बहुत दयालु हैं, और जब वो देखते हैं कि उनका सेवक भौतिक लाभ की इच्छा के बिना काम कर रहा है, तो स्वाभाविक रूप से वो विजित हो जाते हैं।

भक्त हमेशा सेवा में लगे रहते हैं।

स वई मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर

वाचांसि वैकुण्ठ-गुणाనుवर्णने

उनकी सभी इंद्रियों की गतिविधियाँ भगवान की सेवा में व्यस्त हैं। ऐसी भक्ति के कारण, भगवान स्वयं को अपने भक्तों को इस तरह देते हैं जैसे वो उन्हें किसी भी उद्देश्य के लिए उपयोग कर सकते हैं जिसकी उनकी इच्छा हो सकती है। निश्चित रूप से, भक्तों का सेवा के अलावा कोई उद्देश्य नहीं होता। जब एक भक्त पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देता है और भौतिक लाभ की कोई आकांक्षा नहीं रखता, तो भगवान निश्चित रूप से उसे सेवा के सभी अवसर देते हैं। यह भगवान की स्थिति है जब उनके भक्त उन्हें जीत लेते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)