श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  6.16.32 
स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरं
प्रेमाश्रुलेशैरुपमेहयन्मुहु: ।
प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमो
नैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
चित्रकेतु के प्रेम के आँसुओं से भगवान के चरणों का सिंहासन (ठाकुर की चौकी) बार-बार भीग जाता था। वे इतनी खुशी के कारण बोल नहीं पा रहे थे कि लंबे समय तक वो भगवान की तारीफ के लिए एक भी शब्द नहीं बोल पाए।
 
The seat (chowki) of Lord's lotus feet would get wet with the tears of love of Chitraketu again and again. Due to joy, his voice got obstructed and he was unable to utter a single word in proper praise of Lord for a long time.
तात्पर्य
वर्णमाला के सभी अक्षर और उन अक्षरों से बनने वाले शब्द भगवान के लिए प्रार्थना करने के लिए होते हैं। महाराज चित्रकेतु को वर्णमाला के अक्षरों से सुंदर पद रचना करके भगवान को प्रार्थना करने का अवसर मिला, लेकिन अपने उन्माद के कारण, काफी समय तक वह भगवान को प्रार्थना करने के लिए उन अक्षरों को नहीं जोड़ सके। जैसा कि श्रीमद-भागवतम् (1.5.22) में कहा गया है:

इदं हि पुंसः तपसः श्रुतस्य वा

स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धि-दत्तयोः

अविच्युतोऽर्थः कविभिर निरूपितो

यद् उत्तमश्लोक-गुणानुवर्णनम्

यदि किसी के पास वैज्ञानिक, दार्शनिक, राजनीतिक, आर्थिक या कोई अन्य क्षमता है और वह अपने ज्ञान में पूर्णता चाहता है, तो उसे सर्वोच्च भगवान को प्रथम श्रेणी की कविता रचना करके या भगवान की सेवा में अपनी प्रतिभा लगाकर प्रार्थना करनी चाहिए। चित्रकेतु यह करना चाहता था, लेकिन प्रेमपूर्ण उन्माद के कारण वह ऐसा करने में असमर्थ था। इसलिए उसे प्रार्थना करने से पहले काफी समय तक इंतजार करना पड़ा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)