श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  6.16.26 
श्रीशुक उवाच
भक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारद: ।
ययावङ्गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा—चित्रकेतु के पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण करने पर गुरु होने के कारण नारद ने इस स्तुति के द्वारा उसे पूरा उपदेश दिया। हे राजा परीक्षित! तत्पश्चात् अंगिरा ऋषि सहित नारद मुनि ब्रह्मलोक नामक सर्वोच्च लोक के लिए रवाना हो गए।
 
Sri Sukadeva Goswami further said—Since Chitraketu had completely surrendered and had become a Guru, Narada gave him complete advice through this prayer. O King Parikshit! Thereafter, Narada Muni along with sage Angira set out for the highest world called Brahmaloka.
तात्पर्य
जब अंगिरा पहली बार राजा चित्रकेतु से मिलने गए, तो वे अपने साथ नारद को नहीं लाए थे। हालाँकि, चित्रकेतु के पुत्र की मृत्यु के बाद, अंगिरा ने राजा चित्रकेतु को भक्ति-योग के बारे में निर्देश देने के लिए नारद को साथ लाया। अंतर यह था कि शुरुआत में चित्रकेतु वैराग्य के स्वभाव में नहीं थे, लेकिन अपने पुत्र की मृत्यु के बाद, जब वे अपनी महान दुर्दशा से अभिभूत थे, तो उन्हें इस भौतिक दुनिया और भौतिक संपत्ति की मिथ्याता के बारे में निर्देशों द्वारा वैराग्य के मंच पर जगाया गया था। केवल इस स्तर पर ही भक्ति-योग का निर्देश दिया जा सकता है। जब तक कोई भौतिक जीवन की आसक्ति में बंधा होता है, तब तक भक्ति-योग को समझा नहीं जा सकता है। इसकी पुष्टि भगवद-गीता (2.44) में की गई है:

भोगैश्वर्या-प्रसक्तानाम्

तयापहृता-चेतसाम

व्यवसायात्मिका बुद्धिः

समाधौ न विधीयेत

"जो लोग काम-भोग और भौतिक ऐश्वर्य से बहुत अधिक आसक्त होते हैं, और जो इस तरह की चीज़ों से भ्रमित होते हैं, उन लोगों के मन में सर्वोच्च भगवान की भक्ति सेवा का दृढ़ संकल्प नहीं होता है।" जब तक कोई बहुत अधिक भौतिक जीवन में आसक्त होता है, तब तक वह अपने मन को भक्ति सेवा के विषय पर केंद्रित नहीं कर सकता है।

पश्चिमी देशों में कृष्ण भावनामृत आंदोलन वर्तमान में सफलतापूर्वक प्रगति कर रहा है क्योंकि पश्चिम में युवा वैराग्य, या त्याग के चरण में पहुँच गए हैं। वे भौतिक स्रोतों से भौतिक आनंद से व्यावहारिक रूप से घृणा करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों में हिप्पियों की आबादी बढ़ी है। अब यदि इन युवाओं को भक्ति-योग, कृष्ण भावनामृत के बारे में निर्देश दिया जाए, तो निर्देश निश्चित रूप से प्रभावी होंगे।

जैसे ही चित्रकेतु ने वैराग्य-विद्या के दर्शन को समझा, त्याग का ज्ञान, वे भक्ति-योग की प्रक्रिया को समझ सके। इस संबंध में श्रील सर्वभौम भट्टाचार्य ने कहा है, वैराग्य-विद्या-निजा-भक्ति-योग। वैराग्य-विद्या और भक्ति-योग समानांतर रेखाएँ हैं। एक को दूसरे को समझने के लिए आवश्यक है। यह भी कहा गया है, भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्रा च (भाग. 11.2.42)। भक्ति सेवा या कृष्ण भावनामृत में उन्नति को भौतिक जीवन की आसक्ति के निरंतर त्याग की विशेषता है। नारद मुनि भक्ति सेवा के पिता हैं, और इसलिए, राजा चित्रकेतु पर निःस्वार्थ कृपा करने के लिए, अंगिरा नारद मुनि को राजा को निर्देश देने के लिए लाए। ये निर्देश अत्यंत प्रभावी थे। जो कोई भी नारद मुनि के पदचिह्नों का अनुसरण करता है वह निश्चित रूप से एक शुद्ध भक्त है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)