भोगैश्वर्या-प्रसक्तानाम्
तयापहृता-चेतसाम
व्यवसायात्मिका बुद्धिः
समाधौ न विधीयेत
"जो लोग काम-भोग और भौतिक ऐश्वर्य से बहुत अधिक आसक्त होते हैं, और जो इस तरह की चीज़ों से भ्रमित होते हैं, उन लोगों के मन में सर्वोच्च भगवान की भक्ति सेवा का दृढ़ संकल्प नहीं होता है।" जब तक कोई बहुत अधिक भौतिक जीवन में आसक्त होता है, तब तक वह अपने मन को भक्ति सेवा के विषय पर केंद्रित नहीं कर सकता है।
पश्चिमी देशों में कृष्ण भावनामृत आंदोलन वर्तमान में सफलतापूर्वक प्रगति कर रहा है क्योंकि पश्चिम में युवा वैराग्य, या त्याग के चरण में पहुँच गए हैं। वे भौतिक स्रोतों से भौतिक आनंद से व्यावहारिक रूप से घृणा करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों में हिप्पियों की आबादी बढ़ी है। अब यदि इन युवाओं को भक्ति-योग, कृष्ण भावनामृत के बारे में निर्देश दिया जाए, तो निर्देश निश्चित रूप से प्रभावी होंगे।
जैसे ही चित्रकेतु ने वैराग्य-विद्या के दर्शन को समझा, त्याग का ज्ञान, वे भक्ति-योग की प्रक्रिया को समझ सके। इस संबंध में श्रील सर्वभौम भट्टाचार्य ने कहा है, वैराग्य-विद्या-निजा-भक्ति-योग। वैराग्य-विद्या और भक्ति-योग समानांतर रेखाएँ हैं। एक को दूसरे को समझने के लिए आवश्यक है। यह भी कहा गया है, भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्रा च (भाग. 11.2.42)। भक्ति सेवा या कृष्ण भावनामृत में उन्नति को भौतिक जीवन की आसक्ति के निरंतर त्याग की विशेषता है। नारद मुनि भक्ति सेवा के पिता हैं, और इसलिए, राजा चित्रकेतु पर निःस्वार्थ कृपा करने के लिए, अंगिरा नारद मुनि को राजा को निर्देश देने के लिए लाए। ये निर्देश अत्यंत प्रभावी थे। जो कोई भी नारद मुनि के पदचिह्नों का अनुसरण करता है वह निश्चित रूप से एक शुद्ध भक्त है।
