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bhagavat 6.16.23: परम पुरुषोत्तम भगवान से प्रकट होकर परम ब्रह्म आकाश की तरह विस्तृत हो जाता है। हालाँकि कोई भी भौतिक पदार्थ इसे स्पर्श नहीं कर सकता, किंतु यह भीतर और बाहर विद्यमान है। फिर भी, मन, बुद्धि, इंद्रियाँ और जीवन शक्ति न तो इसे स्पर्श कर सकते हैं और न ही इसे जान सकते हैं। मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ।   |   bhagavat अध्याय 6.16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.16.23 
यन्न स्पृशन्ति न विदुर्मनोबुद्धीन्द्रियासव: ।
अन्तर्बहिश्च विततं व्योमवत्तन्नतोऽस्म्यहम् ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
परम पुरुषोत्तम भगवान से प्रकट होकर परम ब्रह्म आकाश की तरह विस्तृत हो जाता है। हालाँकि कोई भी भौतिक पदार्थ इसे स्पर्श नहीं कर सकता, किंतु यह भीतर और बाहर विद्यमान है। फिर भी, मन, बुद्धि, इंद्रियाँ और जीवन शक्ति न तो इसे स्पर्श कर सकते हैं और न ही इसे जान सकते हैं। मैं उन्हें विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ।
 
The Supreme Brahman, emanating from the Supreme Personality of Godhead, spreads out like the sky. Although no material object can touch it, it exists inside and outside. Still, the mind, intellect, senses and life force can neither touch it nor know it. I offer my respectful obeisances unto Him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)