आत्मानन्दानुभूत्यैव न्यस्तशक्त्यूर्मये नम: ।
हृषीकेशाय महते नमस्तेऽनन्तमूर्तये ॥ २० ॥
अनुवाद
अपने व्यक्तिगत आनंद को प्राप्त करते हुए आप हमेशा भौतिक प्रकृति की लहरों के परे हैं। इसलिए, हे प्रभु, मैं आपको अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करता हूँ। आप इंद्रियों के परम नियंत्रक हैं और आपके रूप के विस्तार असीमित हैं। आप सबसे महान हैं, इसलिए मैं आपको अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम अर्पित करता हूँ।
You are always beyond the waves of material nature, experiencing Your personal bliss. Therefore, O Lord, I offer my respectful obeisances unto You. You are the supreme controller (motivator) of the senses and the brightness (expansion) of Your form is infinite. You are the most great, therefore I offer my respectful obeisances unto You.
तात्पर्य
यह श्लोक जीव को सर्वोच्च भगवान से भिन्न बताता है। भगवान का रूप और बद्ध जीव का रूप भिन्न है क्योंकि भगवान सदा आनंदित रहते हैं जबकि बद्ध जीव हमेशा भौतिक दुनिया के त्रिविध दुखों में रहते हैं। परम भगवान सत्-चित्-आनंद-विग्रह हैं। वह अपने आप से ही आनंद प्राप्त करते हैं। भगवान का शरीर पारलौकिक और आध्यात्मिक है, लेकिन क्योंकि बद्ध जीव के पास एक भौतिक शरीर होता है, उसे कई शारीरिक और मानसिक परेशानियां होती हैं। बद्ध जीव हमेशा लगाव और विरक्ति से परेशान रहता है, जबकि सर्वोच्च भगवान हमेशा ऐसी द्वंद्वताओं से मुक्त रहते हैं। भगवान सभी इंद्रियों के सर्वोच्च स्वामी हैं, जबकि बद्ध जीव इंद्रियों के नियंत्रण में रहते हैं। भगवान सबसे महान हैं, जबकि जीव सबसे छोटा है। जीव भौतिक प्रकृति की तरंगों से बंधा है, लेकिन सर्वोच्च भगवान सभी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से परे हैं। सर्वोच्च भगवान के शरीर के विस्तार असंख्य हैं (अद्वैतं अच्युतं आदिम अनंत-रूपम), लेकिन बद्ध जीव सिर्फ एक रूप तक ही सीमित है। इतिहास से हम सीखते हैं कि एक बद्ध जीव, रहस्यमय शक्ति से, कभी-कभी आठ रूपों में विस्तार कर सकता है, लेकिन भगवान के शारीरिक विस्तार असीमित हैं। इसका मतलब यह है कि भगवान के शरीर का कोई आदि और अंत नहीं है, जीवों के शरीर के विपरीत।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥