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bhagavat 6.16.12: श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- जब महाराज चित्रकेतु के पुत्र के रूप में वह बद्धजीव इस प्रकार बोलकर चला गया तब चित्रकेतु और मृत पुत्र के अन्य सम्बन्धी अत्यन्त विस्मित हुए। तब उन्होंने उसके साथ अपने सम्बन्ध से उत्पन्न स्नेह-बन्धन को काट दिया और शोक का त्याग कर दिया।   |   bhagavat अध्याय 6.16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.16.12 
श्रीबादरायणिरुवाच
इत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा ।
विस्मिता मुमुचु: शोकं छित्त्वात्मस्‍नेहश‍ृङ्खलाम् ॥ १२ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा- जब महाराज चित्रकेतु के पुत्र के रूप में वह बद्धजीव इस प्रकार बोलकर चला गया तब चित्रकेतु और मृत पुत्र के अन्य सम्बन्धी अत्यन्त विस्मित हुए। तब उन्होंने उसके साथ अपने सम्बन्ध से उत्पन्न स्नेह-बन्धन को काट दिया और शोक का त्याग कर दिया।
 
Sri Sukadeva Goswami further said—When that conditioned soul in the form of the son of Maharaja Citraketu spoke thus and departed, Citraketu and the other relatives of the dead son were very much astonished. Then they cut off the bond of affection born of their association with him and abandoned mourning.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)