श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 16: राजा चित्रकेतु की परमेश्वर से भेंट  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.16.11 
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।
उदासीनवदासीन: परावरद‍ृगीश्वर: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
कार्य और कारण के स्रष्टा इस आत्मा को फलात्मक कर्मों से मिलने वाले सुख और दुख को स्वीकार नहीं करना चाहिए। वह भौतिक शरीर को स्वीकार करने या न करने में पूर्ण रूप से स्वतंत्र है और भौतिक शरीर न होने के कारण वह हमेशा तटस्थ रहता है। जीव, जो ईश्वर का एक छोटा सा हिस्सा है, में उनके गुण थोड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं। इसलिए किसी भी व्याक्ति को दुख से प्रभावित नहीं होना चाहिए।
 
This soul, the creator of action and cause, does not accept the happiness and sorrow generated by sakaam karmas. He is absolutely free to accept or reject a physical body and due to not having a physical body, he always remains indifferent or neutral. The soul is a different part of God and possesses His qualities in a subtle amount. Therefore, man should not be affected by grief.
तात्पर्य
स्वार्थी प्राणी के मित्र और शत्रु होते हैं। वह अपने पद के गुणों और दोषों से प्रभावित होता है। परंतु परमेश्वर सदैव परात्पर होते हैं। क्योंकि वह ईश्वर है तो परम नियंत्रक है तो वह द्वैत से प्रभावित नहीं होते। इसलिए कहा जाता है कि वह प्रत्‍येक के ह्रदय में तटस्थ साक्षी के तौर पर कारणों और प्रभावों में स्थिति में रहते हैं, जो अच्‍छें और बुरे कर्म हैं। हमें यह भी समझना चाहिए कि उदासिन, तटस्‍थ का मतलब यह नहीं कि वह कोई कार्य नहीं करता। अपितु, इसका मतलब है कि वह व्यक्तिगत रूप से प्रभावित नहीं होता। उदाहरण के लिए, एक न्यायाधीश जब उसके सामने दो विरोधी पक्ष आते हैं तो तटस्‍थ रहता है, लेकिन वह उस केस की वारंट के तहत कार्रवाई करता है। भौतिक कर्मों के प्रति पूर्ण रूप से तटस्‍थ, उदासीन रहने के लिए हमें केवल परम तटस्‍थ व्यक्ति के चरण कमलों में शरण लेनी चाहिए। महाराज चित्रकेतु को सलाह दी गई थी कि अपने पुत्र की मृत्‍यु जैसी कठिन परिस्थितियों में तटस्‍थ रहना असंभव है। फिर भी, चूँकि भगवान सब कुछ समायोजित करना जानते हैं, इसलिए सबसे अच्छा उपाय है उसके ऊपर निर्भर करना और प्रभु को भक्तिपूर्ण सेवा में अपना कर्तव्‍य करना। सभी परिस्थितियों में, द्वैत से विचलित नहीं होना चाहिए। जैसा कि भगवद गीता (2.47) में कहा गया है:

कर्मण्‍येवाधिकारस्‍ते

मा फलेषु कदाचन

मा कर्मफलहेतुर्भूः

मा ते सँगोऽस्‍त्वकर्मणि

"आपको अपने निर्धारित कर्तव्‍य का पालन करने का अधिकार है, परंतु आप कर्म के फलों के अधिकारी नहीं हैं। कभी भी अपने आप को अपनी गतिविधि के परिणामों का कारण न समझें, और अपने कर्तव्‍य को न करने से कभी भी जुड़े नहीं रहें।" किसी को भी अपनी भक्ति पूर्ण ड्यूटी निभानी चाहिए और अपने कर्मों के परिणामों के लिए परमेश्वर के व्‍यक्तित्‍व पर निर्भर रहना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)