अन्याभिलाषिता-शून्यं
ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्
आनुकूल्येन कृष्णानु-
शीलनं भक्तिर उत्तमा
"व्यक्ति को फल देने वाली गतिविधियों या दार्शनिक चिंतन से होने वाले भौतिक लाभ या लाभ की इच्छा के बिना परम भगवान कृष्ण की अनुकूलता से शुद्ध भक्ति सेवा करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।" हमें केवल कृष्ण चेतना विकसित करने के लिए कार्य करना चाहिए। अन्य सभी चीजों के लिए, हमें पूरी तरह से परम व्यक्ति पर निर्भर रहना चाहिए। हमें ऐसी योजनाएँ नहीं बनानी चाहिए जिससे अंततः निराशा हो।
