श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.15.4 
यथा धानासु वै धाना भवन्ति न भवन्ति च ।
एवं भूतानि भूतेषु चोदितानीशमायया ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जब बीजों को धरती में बोया जाता है, तो वे कभी अंकुरित होते हैं और कभी नहीं। कई बार, मिट्टी उपजाऊ नहीं होती है और बीजों की बुवाई बेकार चली जाती है। इसी तरह, परमात्मा की शक्ति से प्रभावित होकर कभी भावी पिता को संतान की प्राप्ति होती है तो कभी गर्भ का निर्माण ही नहीं होता है। इसलिए मनुष्य को माता-पिता जैसे कृत्रिम संबंधों के लिए शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंततः इसका नियंत्रण परमेश्वर के हाथों में है।
 
When seeds are sown in the earth, sometimes they grow and sometimes they do not. Sometimes the earth is not fertile, making the sowing of seeds futile. Similarly, when a father-to-be is compelled by the power of God, sometimes he gets a child and sometimes he does not conceive. Therefore, man should not grieve for artificial relationships like parents, because ultimately its control remains in the hands of God.
तात्पर्य
महाराजा चित्रकेतु वास्तव में निःसंतान थे। इसलिए उन्होंने सैकड़ों और हजारों पत्नियों से विवाह किया, पर सभी बांझ थीं, और वह एक भी संतान नहीं पैदा कर सके। जब अंगिरा ऋषि राजा से मिलने आए, तो राजा ने महान संत से अनुरोध किया कि वह उन्हें कम से कम एक पुत्र प्रदान करें। अंगिरा ऋषि के आशीर्वाद से, माया की कृपा से एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका आयुष्य अल्प था। इसलिए शुरुआत में अंगिरा ऋषि ने राजा से कहा कि उनके पुत्र का जन्म दुख और उल्लास दोनों का कारण बनेगा। राजा चित्रकेतु को विधान या परमेश्वर की इच्छा से पुत्र प्राप्ति नहीं होनी चाहिए थी। जिस प्रकार बाँझ अनाज और अनाज पैदा नहीं कर सकता, उसी प्रकार एक बाँझ व्यक्ति भी परमेश्वर की इच्छा के बिना संतान नहीं पैदा कर सकता। कभी-कभी एक निर्बल पिता और बाँझ माता भी संतान पैदा कर लेते हैं, और कभी-कभी एक सशक्त पिता और एक उर्वर माता निःसंतान ही रहते हैं। वास्तव में, कभी-कभी संतान निरोधक उपायों के बावजूद भी संतान हो जाती है, और इसलिए माता-पिता को गर्भ में पल रहे बच्चे को मार देना पड़ता है। वर्तमान युग में, गर्भ में बच्चे को मारना एक आम बात हो गई है। क्यों? जब हम संतान निरोधक उपाय करते हैं, तो वह असर क्यों नहीं दिखाते हैं? ऐसा क्यों होता है कि कभी-कभी एक बच्चा पैदा हो जाता है और माता-पिता को उसे गर्भ में ही मारना पड़ता है? हमें यह मानना होगा कि हमारे सारे तथा कथित वैज्ञानिक ज्ञान यह निर्धारित नहीं कर सकते कि क्या होगा; जो कुछ भी होता है, वह वास्तव में परम इच्छा पर निर्भर करता है। यह परम इच्छा से ही है कि हम परिवार, समुदाय और व्यक्तित्व के संदर्भ में कुछ स्थितियों में होते हैं। ये सभी माया या भ्रम के वशीभूत होकर हमारी इच्छाओं के अनुसार परमेश्वर की व्यवस्थाएँ हैं। इसलिए भक्ति जीवन में, किसी को कुछ भी इच्छा नहीं करना चाहिए, क्योंकि सब कुछ परम भगवान पर निर्भर करता है। जैसा कि भक्ति-रसामृत-सिंधु (1.1.11) में कहा गया है:

अन्याभिलाषिता-शून्यं

ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्

आनुकूल्येन कृष्णानु-

शीलनं भक्तिर उत्तमा

"व्यक्ति को फल देने वाली गतिविधियों या दार्शनिक चिंतन से होने वाले भौतिक लाभ या लाभ की इच्छा के बिना परम भगवान कृष्ण की अनुकूलता से शुद्ध भक्ति सेवा करनी चाहिए। इसे शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है।" हमें केवल कृष्ण चेतना विकसित करने के लिए कार्य करना चाहिए। अन्य सभी चीजों के लिए, हमें पूरी तरह से परम व्यक्ति पर निर्भर रहना चाहिए। हमें ऐसी योजनाएँ नहीं बनानी चाहिए जिससे अंततः निराशा हो।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)