अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।
एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पद: ॥ २१ ॥
शब्दादयश्च विषयाश्चला राज्यविभूतय: ।
मही राज्यं बलं कोषो भृत्यामात्यसुहृज्जना: ॥ २२ ॥
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदा: ।
गन्धर्वनगरप्रख्या: स्वप्नमायामनोरथा: ॥ २३ ॥
अनुवाद
हे राजन्! अब तुम जीते-जी ऐसे व्यक्ति के कष्टों का अनुभव कर रहे हो, जो पुत्रों और पुत्रियों का पिता होता है। हे सूरसेन देश के राजन! पत्नी, घर, राज्य का ऐश्वर्य, अन्य सम्पत्ति तथा इंद्रिय अनुभूति के विषय सभी एक समान हैं, वे सब क्षणभंगुर हैं। राज्य, सेना, धन, दास, मंत्री, मित्र और संबंधी सभी भय, मोह, शोक और दुखों का कारण हैं। ये दिखावटी शहरों के समान हैं जो कि कल्पना मात्र के होते हैं, मगर वास्तविकता में नहीं होते। चूंकि ये सभी नश्वर हैं इसलिए ये भ्रम, स्वप्न और मन के विचारों से बेहतर नहीं हैं।
हे राजन्! अब तुम जीते-जी ऐसे व्यक्ति के कष्टों का अनुभव कर रहे हो, जो पुत्रों और पुत्रियों का पिता होता है। हे सूरसेन देश के राजन! पत्नी, घर, राज्य का ऐश्वर्य, अन्य सम्पत्ति तथा इंद्रिय अनुभूति के विषय सभी एक समान हैं, वे सब क्षणभंगुर हैं। राज्य, सेना, धन, दास, मंत्री, मित्र और संबंधी सभी भय, मोह, शोक और दुखों का कारण हैं। ये दिखावटी शहरों के समान हैं जो कि कल्पना मात्र के होते हैं, मगर वास्तविकता में नहीं होते। चूंकि ये सभी नश्वर हैं इसलिए ये भ्रम, स्वप्न और मन के विचारों से बेहतर नहीं हैं।