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bhagavat 6.15.11: श्रीकृष्ण के सर्वाधिक प्रिय सेवक, उन वैष्णव ब्राह्मणों, जो अवधूतों जैसा वेष बना लेते हैं, का भ्रमण हम जैसे भौतिकतावादियों के लाभ और उनकी अविद्या को दूर करने के लिए होता है। वे इंद्रिय तृप्ति में आसक्त रहने वाले लोगों के लिए अपनी इच्छानुसार भूमंडल पर विचरण करते रहते हैं।   |   bhagavat अध्याय 6.15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 15: नारद तथा अंगिरा ऋषियों द्वारा राजा चित्रकेतु को उपदेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  6.15.11 
चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रिया: ।
माद‍ृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिन: ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
श्रीकृष्ण के सर्वाधिक प्रिय सेवक, उन वैष्णव ब्राह्मणों, जो अवधूतों जैसा वेष बना लेते हैं, का भ्रमण हम जैसे भौतिकतावादियों के लाभ और उनकी अविद्या को दूर करने के लिए होता है। वे इंद्रिय तृप्ति में आसक्त रहने वाले लोगों के लिए अपनी इच्छानुसार भूमंडल पर विचरण करते रहते हैं।
 
The brahmanas, the most beloved servants of Sri Krishna, who have attained the status of Vaishnavas, sometimes disguise themselves as avadhutas and travel around the globe at will to benefit materialists like us who are always attached to sense gratification and to dispel our ignorance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)