Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
bhagavat 6.14.7: हे मेरे प्रभु, शुकदेव गोस्वामी! यद्यपि वृत्रासुर एक पापी असुर था, किन्तु उसने एक महान क्षत्रिय के समान पराक्रम दिखाकर युद्ध में इन्द्र को प्रसन्न कर लिया। ऐसा असुर भगवान कृष्ण का महान भक्त क्योंकर हो सका? इन विरोधी बातों से मेरे मन में अत्यधिक सन्देह उत्पन्न हो गया है, अतः मैं इस सम्बन्ध में आपसे सुनने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।   |   bhagavat अध्याय 6.14: राजा चित्रकेतु का शोक   ।   bhagavat स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.14.7 
अत्र न: संशयो भूयाञ्छ्रोतुं कौतूहलं प्रभो ।
य: पौरुषेण समरे सहस्राक्षमतोषयत् ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे प्रभु, शुकदेव गोस्वामी! यद्यपि वृत्रासुर एक पापी असुर था, किन्तु उसने एक महान क्षत्रिय के समान पराक्रम दिखाकर युद्ध में इन्द्र को प्रसन्न कर लिया। ऐसा असुर भगवान कृष्ण का महान भक्त क्योंकर हो सका? इन विरोधी बातों से मेरे मन में अत्यधिक सन्देह उत्पन्न हो गया है, अतः मैं इस सम्बन्ध में आपसे सुनने के लिए अत्यधिक उत्सुक हूँ।
 
O Lord, Sukadeva Goswami! Although Vṛtrāsura was a sinful demon, he pleased Indra in battle by displaying the valour of the most exalted Kshatriya. How could such a demon be a great devotee of Lord Kṛṣṇa? These contradictory statements have raised great doubts in my mind, so I am very anxious to hear from you in this regard.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)