श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  6.14.56 
त्वं तात नार्हसि च मां कृपणामनाथां
त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।
अञ्जस्तरेम भवताप्रजदुस्तरं यद्
ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५६ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय पुत्र, मैं असहाय और बहुत दुखी हूँ। तुम्हें मेरा साथ नहीं छोड़ना चाहिए। केवल अपने शोकाकुल पिता की ओर देखो। हम दोनों असहाय हैं क्योंकि पुत्र के बिना हमें घोर नरक में कष्ट सहना पड़ेगा। तुम्ही एकमात्र सहारा हो जिसके बल पर हम इस अंधकारमय प्रदेश से उबर सकते हैं; इसलिए मेरी प्रार्थना है कि तुम निर्दयी यमराज के साथ और आगे मत जाओ।
 
Dear son! I am helpless and extremely sad. You should not leave me. Look at your grieving father. We (both) are helpless because without a son we will have to suffer the tortures of hell. You are the only support by which we can escape from this dark region; therefore I pray that you do not go further with the merciless Yamaraja.
तात्पर्य
वैदिक उपदेशों के अनुसार, व्यक्ति को एक पत्नी स्वीकार इसलिए करनी चाहिए ताकि वह एक पुत्र उत्पन्न कर सके जो उसे यमराज के चंगुल से मुक्त कर सके। जब तक व्यक्ति के पास अपने पितरों को तर्पण अर्पित करने के लिए एक पुत्र नहीं होता, तब तक उसे यमराज के राज्य में कष्ट सहना पड़ता है। राजा चित्रकेतु अत्यंत दुखी थे, यह सोचकर कि क्योंकि उनका पुत्र यमराज के साथ जा रहा है, उन्हें ही पुनः कष्ट झेलना पड़ेगा। कर्मियों के लिए सूक्ष्म नियम हैं; यदि व्यक्ति भक्त बन जाता है, तो उस पर कर्म के नियमों का कोई दायित्व नहीं रहता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)