श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 14: राजा चित्रकेतु का शोक  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  6.14.40 
धिगप्रजां स्त्रियं पापां पत्युश्चागृहसम्मताम् ।
सुप्रजाभि: सपत्नीभिर्दासीमिव तिरस्कृताम् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
पत्नी को पुत्र न होने के कारण घर में पति उपेक्षा करता है और सौतन भी दासी जैसा अनादर करती हैं। ऐसे में स्त्री अपने पापी जीवन की वजह से हर जगह निंदित होती है।
 
A wife who does not have a son is neglected by her husband at home and is disrespected like a slave by her co-wives. Certainly such a woman is condemned in every way due to her sinful life.
तात्पर्य
हिन्दी-पाठ्य: जैसा कि चाणक्य पंडित ने कहा है:

माता यस्य गृहे नास्‍ति

भार्या चाप्रिय-वादिनि

अरण्यं तेन गंतव्यं

यथाऽरण्यं तथा गृहम्

"वह व्यक्ति जिसके घर में माता नहीं है और जिसकी पत्नी मीठी नहीं बोलती है, उसे वन में चले जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के लिए घर में रहना और वन में रहना बराबर है।" उसी तरह, जिस स्त्री का कोई पुत्र नहीं है, जिसकी पति परवाह नहीं करता है और जिसकी सह-पत्नियां उसकी उपेक्षा करती हैं और उसके साथ एक नौकरानी की तरह व्यवहार करती हैं, उसके लिए घर में रहने की तुलना में जंगल जाना बेहतर है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)